मथुरा के फालैन गांव में होलिका दहन की अनोखी परंपरा
फालैन गांव की होलिका दहन परंपरा
मथुरा: रंगों का त्योहार होली ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज के साथ शुरू हो चुका है। फूलों की होली, लठमार होली और लड्डू की होली सभी का मन मोह लेती हैं। कृष्ण नगरी मथुरा के फालैन गांव में एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां के लोग सदियों से चली आ रही परंपरा का पालन भक्ति और विश्वास के साथ करते हैं।
मथुरा जिले के फालैन गांव में होलिका दहन की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है, जो भक्त प्रह्लाद की आस्था और अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है। यह गांव 'प्रह्लाद की नगरी' के नाम से जाना जाता है, और यहां होलिका दहन केवल अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि अटूट विश्वास, तपस्या और साहस का उदाहरण भी है।
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, फालैन गांव का होलिका दहन आस्था का एक अद्भुत उत्सव है। होलिका दहन से लगभग 45 दिन पहले गांव का पुजारी कठोर व्रत, तप, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि-शयन और विशेष अनुष्ठान आरंभ करता है। प्रह्लाद मंदिर में रहकर वह दिन में एक बार भोजन करता है और सात्विक जीवन जीता है।
होलिका दहन की रात, प्रह्लाद कुंड में स्नान और पूजा के बाद विशाल होलिका प्रज्वलित की जाती है। जब आग प्रचंड रूप ले लेती है और अंगारे दहकने लगते हैं, तब पुजारी नंगे पैर, निडर होकर जलती हुई होलिका के बीच से गुजरता है या दौड़ लगाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है।
यह परंपरा सतयुग से चली आ रही मानी जाती है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी है। होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की आस्था से वह खुद जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। फालैन में पुजारी इसी घटना का जीवंत रूप निभाते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ।