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ममता बनर्जी की पार्टी में बिखराव: क्या है भविष्य?

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में हाल ही में बिखराव की स्थिति उत्पन्न हुई है, जिसमें 58 विधायकों ने अलग गुट बनाया है। इसके साथ ही, 41 सांसदों में से 30 से अधिक सांसदों के भी अलग गुट बनाने की संभावना है। इस स्थिति ने ममता और अभिषेक बनर्जी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को फिर से एकजुट कर पाएंगी? जानिए इस लेख में तृणमूल कांग्रेस के भविष्य के बारे में।
 

पार्टी के भीतर संकट


ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायकों के अलग गुट बनाने के बाद अब उनके 41 सांसदों में से 30 से अधिक सांसदों के भी अलग गुट बनाने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो भारतीय जनता पार्टी संसद के दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत के करीब पहुंच जाएगी। इस स्थिति में ममता और अभिषेक बनर्जी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, वे अब सच होती दिख रही हैं। किसी ने नहीं सोचा था कि ममता बनर्जी की मेहनत से बनी पार्टी इतनी जल्दी बिखर जाएगी। तृणमूल कांग्रेस का यह बिखराव पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक हिस्सा है, जहां सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टियां कमजोर होती हैं।


1977 में कांग्रेस पार्टी के सत्ता से बाहर होने के बाद भी वह कई दशकों तक एक राजनीतिक शक्ति बनी रही। इसी तरह वाम मोर्चा ने 2011 में हारने के बाद भी 2016 के चुनाव में मजबूती से भाग लिया। लेकिन तृणमूल कांग्रेस का बिखराव बहुत तेजी से हो रहा है।


पार्टी की सुप्रीम लीडर ममता बनर्जी ने हाल ही में एक बैठक बुलाई, जिसमें केवल तीन लोकसभा और दो राज्यसभा सांसद शामिल हुए। पार्टी के 41 सांसदों में से केवल पांच ने बैठक में भाग लिया। इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से 58 ने बगावत कर दी है।


बागी गुट में कई मुस्लिम विधायक भी शामिल हैं, जो मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ अच्छे संबंध रखते हैं। ममता बनर्जी की बैठक में केवल आठ विधायक पहुंचे, जो इस बात का संकेत है कि पार्टी के कई नेता पार्टी छोड़ने की सोच रहे हैं।


ममता बनर्जी की स्थिति अब कमजोर होती जा रही है। यदि वे इस स्थिति को स्वीकार नहीं करतीं, तो पार्टी का बिखराव और बढ़ सकता है। अभिषेक बनर्जी के प्रति नाराजगी ने पार्टी के भीतर और आम जनता के बीच भी असंतोष पैदा किया है।


पार्टी के विभाजन के कई कारण हैं, जिनमें से एक यह है कि ममता बनर्जी ने पार्टी का कामकाज एक एजेंसी के हवाले कर दिया था। इसके अलावा, पार्टी की तुष्टिकरण नीतियों ने भी कई नेताओं को नाराज किया है।


अब सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी वापसी कर सकती हैं? इसकी संभावना कम है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस का गठन किसी विचारधारा पर आधारित नहीं था। भाजपा ने एक वैकल्पिक व्यवस्था पेश की है, जबकि ममता बनर्जी पुराने ढर्रे पर चलने की कोशिश कर रही हैं।