महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद का विशेष सत्र: विपक्ष का विरोध
संसद का विशेष सत्र शुरू
आज संसद का विशेष सत्र आरंभ हो रहा है, जिसमें तीन दिनों के भीतर महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित तीन विधेयकों को पारित कराने की योजना है। विपक्षी दल, जिनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) शामिल हैं, का कहना है कि वे परिसीमन के खिलाफ हैं। उनका आरोप है कि यह महिला आरक्षण का बिल नहीं, बल्कि परिसीमन का बिल है, जिसे महिला आरक्षण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का यह प्रयास विफल हो सकता है, क्योंकि परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्ष का समर्थन आवश्यक है।
केंद्र की योजनाएँ
इस विशेष सत्र में, नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 पेश कर रही है। इन विधेयकों के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। इसके साथ ही, राज्यों की विधानसभाओं में भी एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, इस परिसीमन विधेयक का विरोध विपक्ष द्वारा किया जा रहा है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विधेयक पेश करने से पहले, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के निवास पर कई विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें परिसीमन से संबंधित प्रावधानों का विरोध करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण को लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों के आधार पर 2029 से लागू किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा था कि यदि 2029 में लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव महिला आरक्षण के साथ कराए जाते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत होगा।
संविधान संशोधन विधेयक की आवश्यकता
प्रधानमंत्री ने देश की महिलाओं को एक पत्र में लिखा था कि जब महिलाएं नीति-निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेंगी, तब भारत की विकास यात्रा और भी तेज होगी। संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में कुल सदस्यों की संख्या के दो तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। वर्तमान में, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास लोकसभा में यह आंकड़ा नहीं है, इसलिए बिना विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के समर्थन के, यह विधेयक पारित नहीं हो सकता।
संख्यात्मक गणना
संविधान संशोधन विधेयक के लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। लोकसभा में 543 सांसदों में से दो तिहाई बहुमत का मतलब है 362 सांसदों का समर्थन। वर्तमान में, बीजेपी और एनडीए इस संख्या से काफी दूर हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 292 सीटें मिली थीं, जबकि विपक्षी गठबंधन को 230 सीटें मिली थीं। इस हिसाब से, सत्ताधारी एनडीए को इस विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्ष से कम से कम 70 सांसदों का समर्थन चाहिए।
विपक्ष की ताकत
विपक्ष में सबसे बड़ा दल कांग्रेस है, जिसके पास 99 सांसद हैं। इसके बाद समाजवादी पार्टी के पास 37, तृणमूल कांग्रेस के पास 29 और द्रविड़ मुनेत्र कझगम के पास 22 सांसद हैं। ये सभी दल परिसीमन के खिलाफ हैं। यदि सत्ताधारी गठबंधन इस विधेयक को पारित कराना चाहता है, तो उसे कांग्रेस का समर्थन आवश्यक है। यदि बीजेपी कुछ अन्य दलों को भी अपने साथ लाने में सफल होती है, तब भी यह पर्याप्त नहीं होगा।
राज्यसभा में स्थिति
राज्यसभा में भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो सकती है। वहां दो तिहाई बहुमत के लिए 167 सांसदों के वोट की आवश्यकता है। विपक्षी कांग्रेस के पास 28, टीएमसी के पास 13, AAP के पास 10, डीएमके के पास 8 और समाजवादी पार्टी के पास 4 सांसद हैं। एनडीए के सहयोगियों के साथ मिलाकर कुल 135 सांसद ही होते हैं। यदि कुछ दलों के सांसद अपनी पार्टी के खिलाफ भी जाते हैं, तब भी यह विधेयक पारित नहीं हो सकेगा और यहां भी कांग्रेस का समर्थन आवश्यक होगा।