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महिला आरक्षण बिल: क्या बदल सकता है भारतीय राजनीति का चेहरा?

केंद्र सरकार महिला आरक्षण बिल को लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इस योजना के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। प्रस्तावित बदलावों से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हो सकती है। इसके साथ ही, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी बढ़ोतरी का अनुमान है। हालांकि, इस बड़े बदलाव को लागू करने के लिए राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होगी। जानें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर और क्या हो रहा है।
 

महिला आरक्षण की दिशा में सरकार के कदम


नई दिल्ली: केंद्र सरकार संसद के वर्तमान सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए तेजी से कदम उठा रही है। यदि यह योजना सफल होती है, तो आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जिससे राजनीति का स्वरूप बदल सकता है। सरकार इस सत्र में कम से कम दो महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की योजना बना रही है, जिनमें एक संविधान संशोधन भी शामिल है।


आरक्षित सीटों का प्रस्ताव

प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक अवसर प्रदान करना है। सरकार की योजना के तहत लोकसभा की कुल सीटों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया जा सकता है, जिसमें मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 816 करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी।


नई सीटों का आरक्षण

इन नई सीटों में से एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इससे संसद में बहुमत का आंकड़ा 409 तक पहुंच जाएगा। इस कदम का एक बड़ा लाभ यह होगा कि मौजूदा सांसदों की सीटों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और नई सीटों के माध्यम से आरक्षण लागू किया जा सकेगा।


पुराने आंकड़ों का उपयोग

परिसीमन और जनगणना का मुद्दा

पहले महिला आरक्षण को नई जनगणना और परिसीमन से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन अब सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए पुराने आंकड़ों का उपयोग करने पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराकर 2029 के बाद होने वाले चुनावों में यह आरक्षण लागू किया जा सकता है। इससे प्रक्रिया में देरी नहीं होगी और योजना समय पर लागू हो सकेगी।


राज्यों का प्रतिनिधित्व

राज्यों की हिस्सेदारी पर असर नहीं

कुछ राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में, यह चिंता जताई जा रही थी कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के बंटवारे से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। सरकार ने इस आशंका को दूर करने के लिए हर राज्य की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि का प्रस्ताव रखा है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120, बिहार की 40 से 60 और केरल की 20 से 30 हो सकती हैं। इससे सभी राज्यों का अनुपात संतुलित बना रहेगा।


अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण

SC/ST सीटों में भी बढ़ोतरी

महिला आरक्षण के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी बढ़ोतरी का अनुमान है। SC सीटें 84 से बढ़कर 126 और ST सीटें 47 से बढ़कर 70 तक जा सकती हैं। वहीं, छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रोटेशन के आधार पर हर कुछ चुनावों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी।


राजनीतिक सहमति की आवश्यकता

राजनीतिक सहमति की चुनौती

इस बड़े बदलाव को लागू करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। इसके लिए सरकार को अन्य दलों का समर्थन जुटाना होगा। इस दिशा में कई राजनीतिक दलों से बातचीत की जा रही है। हालांकि, कुछ विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग मांगें रखी हैं।

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियां महिला आरक्षण के भीतर OBC वर्ग के लिए अलग कोटा चाहती हैं, जबकि कुछ दल सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहे हैं। सरकार चाहती है कि इस विधेयक को बजट सत्र के दौरान ही पारित करा लिया जाए। यदि आवश्यक हुआ, तो सत्र को बढ़ाया जा सकता है या इस मुद्दे पर विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है।