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मोबाइल अनुशासन और जेन-ज़ेड: एक नई सोच की आवश्यकता

मोहन भागवत ने हाल ही में मोबाइल अनुशासन की आवश्यकता पर जोर दिया और जेन-ज़ेड पीढ़ी की भावनात्मक सोच पर सवाल उठाया। भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन के विकास ने न केवल जीवन के तरीके को बदला है, बल्कि राजनीतिक संवाद को भी प्रभावित किया है। इस लेख में जानें कि कैसे जेन-ज़ेड ने अपने पूर्वजों की सोच को चुनौती दी है और क्यों यह पीढ़ी अपने तरीके से जीने का हक रखती है।
 

मोहन भागवत की टिप्पणी और मोबाइल अनुशासन

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण विचार साझा किया। उन्होंने धर्मेद्र प्रधान के इस्तीफे के दिन सुबह हैदराबाद में 'समकालीन मातृत्व' कार्यक्रम में कहा, "समाज में बदलाव लाने के लिए पहले खुद से शुरुआत करें। सोशल मीडिया पर कम समय बिताएं और मोबाइल का अनुशासन अपनाएं।" इसके साथ ही उन्होंने जेन-ज़ेड पीढ़ी के बारे में कहा कि यह पीढ़ी "भावुक है और शांत मन से नहीं सोचती।"


भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन का विकास

इस बात से असहमत होना मुश्किल है कि मोबाइल अनुशासन आज की आवश्यकता है। पिछले बारह वर्षों में भारत ने न केवल इंटरनेट को अपनाया है, बल्कि इसके प्रति एक प्रकार की आसक्ति भी विकसित की है। आंकड़े बताते हैं कि 2014 में भारत में लगभग 25 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो सितंबर 2025 तक बढ़कर लगभग 102 करोड़ हो गए। आज भारत स्मार्टफोन का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है, जहां लगभग 75 करोड़ स्मार्टफोन हैं और लगभग 50 करोड़ लोग सोशल मीडिया का सक्रिय उपयोग करते हैं।


स्मार्टफोन का राजनीतिक प्रभाव

यह वृद्धि केवल संख्याओं में नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के जीवन के तरीके में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। इसकी मुख्य वजह 2016 में रिलायंस जियो का आगमन था, जिसने सस्ते डेटा और सुलभ स्मार्टफोन को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बदलाव को समझा और स्मार्टफोन को नेता और मतदाता के बीच के बिचौलियों को खत्म करने का एक साधन माना।


डिजिटल इंडिया और राजनीतिक संवाद

इस डिजिटल क्रांति को 'डिजिटल इंडिया' कहा गया, जिसे राष्ट्रीय प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया गया। भारतीयों ने इसे उत्साह से अपनाया, लेकिन धीरे-धीरे स्मार्टफोन केवल डिजिटल भागीदारी का साधन नहीं रह गया, बल्कि यह राजनीतिक संवाद का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन गया।


मोबाइल अनुशासन का राष्ट्रीय अभियान

भागवत ने यह भी कहा कि बच्चे इसलिए मोबाइल से चिपके रहते हैं क्योंकि उनके माता-पिता भी अपने फोन से अलग नहीं होते। यदि मोबाइल अनुशासन का राष्ट्रीय अभियान चलाना है, तो इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री को स्वयं करनी होगी।


जेन-ज़ेड की सोच और दृष्टिकोण

हालांकि, भागवत की दूसरी टिप्पणी सही नहीं है। उन्होंने कहा कि जेन-ज़ेड भावुक है, लेकिन मैंने देखा कि यह पीढ़ी तर्क के आधार पर सोचती है। उन्होंने अपने माता-पिता को उन नौकरियों की शिकायत करते देखा जिन्हें उन्होंने कभी छोड़ा नहीं। जेन-ज़ेड ने यह समझा है कि जीवन में संतोष पाने के लिए कष्ट सहना जरूरी नहीं है।


नए सवाल और बदलाव की आवश्यकता

जेन-ज़ेड ने यह विरासत को नामंजूर कर दिया है। यह पीढ़ी यह नहीं मानती कि सार्थक जीवन जीने के लिए पहले लंबे समय तक कष्ट सहना जरूरी है। यह एक ऐसी पीढ़ी है जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु संकट के समय में जवान हो रही है। इसलिए, जेन-ज़ेड केवल एक सवाल पूछती है—"मुझे इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए?"