मोहन भागवत का भाषण: पुरानी बातें, नया अंदाज नहीं
आरएसएस प्रमुख का भाषण
मोहन भागवत ने 20 अक्टूबर को संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष के समापन समारोह में जो बातें कहीं, उनमें न तो कुछ नया था और न ही उनका कहने का तरीका अलग था। उनके भाषण में दो मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया गया: पहला, भारत में हो रहे प्रदर्शन देश विरोधी ताकतों की साजिश हैं, और दूसरा, कुछ देश भारत की बढ़ती ताकत से जलते हैं। ये बातें भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा पहले से कही जा रही हैं।
भाजपा के नेता और संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि कुछ देश भारत की तरक्की से जलते हैं। यह एक पुराना नैरेटिव है, जो हर सरकार ने अपने कार्यकाल में विदेशी साजिशों के आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया है। हालांकि, यह सच है कि दुनिया के देश एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें करते हैं। अमेरिका और रूस का शीत युद्ध इसका एक उदाहरण है।
भारत की स्थिति पर बात करें तो पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है और भारत के खिलाफ छद्म युद्ध चला रहा है। लेकिन भागवत ने इस पर कोई चर्चा नहीं की। उन्होंने अमूर्त तरीके से बात की, जिससे यह समझना मुश्किल था कि वे किस देश की बात कर रहे हैं। यह संभवतः अमेरिका और चीन की ओर इशारा था।
भारत ने हाल ही में कोई विशेष तरक्की नहीं की है। आज भी भारत दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है। प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में भारत का स्थान बहुत नीचे है। सरकार 80 करोड़ लोगों को अनाज दे रही है।
हालांकि, यह दावा किया जा रहा है कि भारत अब विश्वगुरू बन गया है। फिर भी, यह सवाल उठता है कि अगर कुछ देश साजिश कर रहे हैं, तो भारत क्या कर रहा है? चीन के साथ व्यापार बढ़ रहा है, और भारत उसकी आर्थिक जरूरतों पर निर्भर होता जा रहा है।
संघ प्रमुख ने कहा कि प्रदर्शन करने वालों को विदेशी एजेंट बताना सत्ता पक्ष का पुराना तरीका है। पहले भी जब जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन किया था, तब उन्हें भी विदेशी एजेंट कहा गया था। अब हर असहमति को विदेशी साजिश बताने का प्रयास किया जा रहा है।