मोहन भागवत का यूजीसी दिशानिर्देश पर बड़ा बयान: कानून नहीं बनेगा
आरएसएस प्रमुख का स्पष्ट बयान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में एक जैन धर्मगुरु से मुलाकात के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के समानता संबंधी दिशानिर्देशों पर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यूजीसी द्वारा जारी किए गए ये दिशानिर्देश अभी कानून नहीं बने हैं और भविष्य में भी ऐसा नहीं होगा। इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
पहला सवाल यह है कि क्या मोहन भागवत की बातों में कोई सरकारी प्राधिकरण शामिल है, जो यह कहता है कि यह कभी कानून नहीं बनेगा? सभी जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर संघ का प्रभाव कितना है, लेकिन क्या संघ प्रमुख इस तरह की सार्वजनिक घोषणा कर सकते हैं? दूसरा सवाल यह है कि इस ऐलान की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इस साल फरवरी में, यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता स्थापित करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनका व्यापक विरोध हुआ था। यह निर्देश सामान्य वर्ग के छात्रों को अपराधी बना सकता था, जिससे उनके खिलाफ उत्पीड़न के आरोप लग सकते थे। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इन दिशानिर्देशों पर रोक लगा दी।
मोहन भागवत का यह बयान इस बात का संकेत है कि संघ और भाजपा सामान्य वर्ग की नाराजगी को गंभीरता से ले रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यदि सामान्य वर्ग नाराज हो गया, तो उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि वह इन दिशानिर्देशों पर पुनर्विचार कर रही है।
इस बीच, सरकार के एक सूचना सलाहकार दिलीप मंडल ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने सामान्य वर्ग को दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार ठहराया। हालांकि, उनके सुर में बदलाव देखा गया, जिसमें उन्होंने अधिकारियों पर आरोप लगाते हुए राजनीतिक नेतृत्व को बचाने का प्रयास किया।