मोहन भागवत ने मुंबई में संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया
आरएसएस प्रमुख का महत्वपूर्ण संबोधन
डिजिटल, पर्दाफाश। मुंबई में आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को वैश्विक चुनौतियों और उनके बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर चर्चा की। अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन में उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में विकास की चाहत के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा की चुनौती भी मौजूद है। इसके साथ ही, व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वृद्धि के कारण पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी परिवर्तन आ रहे हैं।
समस्याओं का समाधान संतुलन में है
भागवत ने कहा कि कई स्थितियों में एक लक्ष्य की प्राप्ति के प्रयास में दूसरे पक्ष पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार, विकास और पर्यावरण, स्वतंत्रता और परिवार, तथा धार्मिक आस्था और संघर्ष जैसे मुद्दों में संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी एक पक्ष को चुनकर दूसरे को नजरअंदाज करने से समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।
उन्होंने भारत की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने बिना किसी अन्य राष्ट्र पर कब्जा किए और लोगों का धर्मांतरण कराए, अपनी ज्ञान परंपरा को साझा किया है। भागवत ने कहा कि आज की दुनिया भारत से समाधान की उम्मीद कर रही है।
ज्ञान परंपरा का महत्व
आरएसएस प्रमुख ने भारत की ज्ञान परंपरा को विस्तृत बताते हुए वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसी शिक्षाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास ज्ञान का एक विशाल भंडार है, जिसकी आज दुनिया को आवश्यकता है।
भागवत ने अपने भाषण में धर्म और राष्ट्र के संबंध पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में दोनों को अलग नहीं किया जा सकता और ये एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। उन्होंने ज्ञान और परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले व्यक्तियों के संरक्षण को मानवता की सेवा से जोड़ा।