योगी आदित्यनाथ ने 9 लाख नौकरियों का ऐतिहासिक आंकड़ा पार किया
नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री का संबोधन
लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के लोक भवन सभागार में नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग के 357 नए कनिष्ठ विश्लेषकों (औषधि) और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के 252 दंत स्वास्थ्य विज्ञानियों को नियुक्ति पत्र प्रदान किए गए। उन्होंने कहा कि 'मिशन रोजगार' को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) द्वारा यह भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष, पारदर्शी और सुचारु रूप से संपन्न की गई है, जो सुशासन और समान अवसरों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि जब कार्य करने की दृढ़ इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीति और ईमानदारी होती है, तो परिणाम अपने आप सामने आते हैं। इसी दिशा में किए गए निरंतर प्रयासों का परिणाम है कि अब तक हमने 9 लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरी दी है। यह किसी भी राज्य द्वारा पारदर्शी और सुचारु रूप से संपन्न की गई सबसे बड़ी नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड है।
उन्होंने यह भी बताया कि अगले वर्ष, यानी 2026-27 में, उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड के माध्यम से डेढ़ लाख से अधिक भर्तियों की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। भर्ती प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धांधली करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ आजीवन कारावास और सम्पत्ति जब्ती की कार्रवाई की जाएगी। हमारे पास इसके लिए सख्त कानून हैं और उनका प्रभावी पालन किया जाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हर माता-पिता की ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त करे और एक सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़े। इसके लिए वे हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन जब अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, तो न केवल उस युवा के सपने टूटते हैं, बल्कि उनके माता-पिता और परिवार की उम्मीदें भी चकनाचूर हो जाती हैं। किसी युवा के सपनों का टूटना केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ धोखा है। उत्तर प्रदेश की 'बीमारू राज्य' के रूप में पहचान बनाने में चयन प्रक्रियाओं में भेदभाव, बेईमानी और भ्रष्टाचार की भूमिका थी। भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताएं इतनी अधिक थीं कि न्यायालय को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता था।