राज्यपाल की रिपोर्ट: भारतीय राजनीति में बदलाव की कहानी
राजनीति में रिपोर्टों का प्रभाव
भारतीय राजनीति में कई बार सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम चुनावी रैलियों, संसद की बहसों या प्रमुख नेताओं के बयानों से नहीं, बल्कि राजभवन से आई एक रिपोर्ट से शुरू हुए हैं।
एक संक्षिप्त रिपोर्ट, जिसमें राज्यपाल की राय होती है, केंद्र सरकार के समक्ष ऐसे निर्णय प्रस्तुत करती है, जिनका प्रभाव केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहता। कभी-कभी यह रिपोर्ट किसी निर्वाचित सरकार को हटाने की सिफारिश करती है, कभी राष्ट्रपति शासन लागू होता है, और कभी विधानसभा भंग कर दी जाती है। कुछ मामलों में, राज्यपाल की रिपोर्ट पर उठे सवाल इतने गंभीर हो जाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान की व्याख्या करनी पड़ती है।
भारत के राजनीतिक इतिहास में राज्यपाल की रिपोर्ट केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रही है। कई बार इसने केंद्र और राज्य के संबंधों, दिल्ली की सत्ता और भारतीय संघवाद की दिशा को प्रभावित किया है।
एक दिलचस्प उदाहरण है जब कर्नाटक की सरकार को एक राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर हटा दिया गया। यह मामला अदालत में गया और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय ने राष्ट्रपति शासन लागू करने के नियमों को बदल दिया।
यह लेख उन रिपोर्टों की कहानी है, जो कभी सत्ता परिवर्तन का आधार बनीं और कभी सत्ता की मनमानी पर संवैधानिक रोक लगाने का कारण बनीं।
राज्यपाल की रिपोर्ट का महत्व
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 कहता है कि यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या किसी अन्य माध्यम से यह विश्वास हो जाए कि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चल रही है, तो वह राष्ट्रपति शासन लागू कर सकते हैं।
इसका मतलब है कि राज्यपाल की रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि राज्यपाल की रिपोर्ट अपने आप में किसी सरकार को नहीं हटाती।
संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 के तहत घोषणा करते हैं, और इसके पीछे केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद की भूमिका होती है। राज्यपाल की रिपोर्ट उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सामग्री या आधार हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एस.आर. बोम्मई मामले में स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 की शक्ति राष्ट्रपति के माध्यम से प्रयोग होती है, न कि राज्यपाल के पास किसी निर्वाचित सरकार को सीधे हटाने की स्वतंत्र शक्ति होती है।
हालांकि, इतिहास बताता है कि कई बार राजभवन से दिल्ली भेजी गई रिपोर्ट ने राजनीतिक घटनाओं की दिशा बदल दी।
1959: केरल संकट
राज्यपाल की रिपोर्ट और केंद्र के हस्तक्षेप से जुड़ी सबसे चर्चित घटनाओं में 1959 का केरल संकट शामिल है। 1957 में ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद के नेतृत्व में केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। यह लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता में आने वाली दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकारों में से एक मानी जाती है।
लेकिन सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक आंदोलन शुरू हुआ। अंततः 1959 में केंद्र ने अनुच्छेद 356 के तहत केरल सरकार को बर्खास्त कर दिया। इस निर्णय ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा किया कि क्या केंद्र किसी राज्य की निर्वाचित सरकार को राजनीतिक और प्रशासनिक संकट के आधार पर हटा सकता है, जबकि सरकार विधानसभा में बहुमत रखती हो?
बाद के दशकों में यही सवाल बार-बार विभिन्न राज्यों में सामने आया। संसद में हुई बहसों और बाद के संवैधानिक विश्लेषणों में भी केरल का मामला अनुच्छेद 356 के विवादित उपयोग के शुरुआती बड़े उदाहरणों में गिना गया।
1977 और 1980: सरकारों का बदलाव
राज्यपालों की रिपोर्ट और राष्ट्रपति शासन की राजनीति को समझने के लिए 1977 और 1980 के घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं। 1977 में आपातकाल के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। इसके बाद कांग्रेस शासित नौ राज्यों की सरकारों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए। फिर राष्ट्रपति शासन और विधानसभा भंग करने का दौर शुरू हुआ।
तीन साल बाद तस्वीर पलट गई। 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई और इस बार गैर-कांग्रेसी सरकारों वाले राज्यों पर संकट आ गया। कई राज्यों में फिर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।
सरकारें बदलती रहीं, लेकिन सवाल वही बना रहा कि क्या लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता बदलने का मतलब यह है कि राज्यों की निर्वाचित सरकारों को भी नया जनादेश लेना चाहिए?
सरकारिया आयोग के अध्ययन में भी 1977 और 1980 में बड़े पैमाने पर अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को गंभीर संवैधानिक बहस का विषय बताया गया। आयोग के रिकॉर्ड में यह उल्लेख मिलता है कि दोनों मौकों पर नौ-नौ राज्यों की सरकारों को लेकर बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई और इसकी संवैधानिक उपयुक्तता पर व्यापक सवाल उठे।
कर्नाटक का मामला
1989 में कर्नाटक में मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई की सरकार राजनीतिक संकट से गुजर रही थी। कुछ विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस लेने की बात कही। इसके बाद राज्यपाल पी. वेंकटसुब्बैया ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी कि सरकार विधानसभा में बहुमत खो चुकी है। यहीं से कहानी ने बड़ा मोड़ लिया।
बोम्मई का कहना था कि उन्हें विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। उनके समर्थन को लेकर स्थिति भी बदल रही थी और कुछ विधायकों ने बाद में अपने पहले के रुख पर सवाल उठाए, लेकिन सरकार को विधानसभा में शक्ति परीक्षण का मौका नहीं मिला।
21 अप्रैल 1989 को अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। एक राज्यपाल की रिपोर्ट ने कर्नाटक की सरकार का भविष्य तय कर दिया था, लेकिन यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
एस.आर. बोम्मई केस
एस.आर. बोम्मई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और पांच साल बाद आया वह फैसला, जिसने भारतीय राजनीति में राज्यपाल की रिपोर्ट और राष्ट्रपति शासन की पूरी बहस को नई दिशा दे दी।
11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश था- किसी सरकार के बहुमत पर संदेह होने की स्थिति में सामान्य नियम के तौर पर उसका परीक्षण विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं है। यानी केंद्र सरकार सिर्फ 'संवैधानिक संकट' कहकर किसी राज्य की निर्वाचित सरकार को मनमाने तरीके से नहीं हटा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सरकारिया आयोग की सिफारिशों और अनुच्छेद 356 के बार-बार इस्तेमाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई। अदालत ने माना कि यह शक्ति संविधान में असाधारण परिस्थितियों के लिए है और इसके प्रयोग की जांच की जा सकती है।
राज्यपाल की रिपोर्ट का प्रभाव
एस.आर. बोम्मई मामले की सबसे बड़ी खासियत यही थी। शुरुआत एक राज्य के राजनीतिक संकट से हुई थी। राज्यपाल ने रिपोर्ट भेजी, केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और फैसले ने पूरे भारत के लिए एक संवैधानिक सिद्धांत तय कर दिया।
अब राज्यपाल की रिपोर्ट को अंतिम राजनीतिक फैसला नहीं माना जा सकता था। अगर किसी मुख्यमंत्री के बहुमत पर सवाल है, तो सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा में शक्ति परीक्षण सबसे महत्वपूर्ण तरीका बन गया। यही कारण है कि आज भी जब किसी राज्य में सरकार गिरने या बहुमत खोने का विवाद पैदा होता है, तो सबसे पहले एक शब्द सुनाई देता है- फ्लोर टेस्ट।
सरकारिया आयोग की सिफारिशें
राज्यपालों की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर बढ़ते विवादों के बीच 1983 में सरकारिया आयोग का गठन किया गया। आयोग का काम केंद्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा करना था। अनुच्छेद 356 और राज्यपाल की भूमिका इस बहस के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल थे।
सरकारिया आयोग ने अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को अंतिम विकल्प के रूप में देखने की सिफारिश की। आयोग का मूल संदेश था कि निर्वाचित राज्य सरकार को हटाना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनना चाहिए।
राज्यपाल की भूमिका
यहां भारतीय राजनीति का सबसे विवादित सवाल सामने आता है। राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और व्यवहार में नियुक्ति केंद्र सरकार की सलाह पर होती है।
जब राज्यपाल और किसी विपक्षी दल की राज्य सरकार के बीच टकराव होता है, तो राजनीतिक आरोप तेजी से सामने आते हैं। राज्य सरकार कहती है कि राजभवन केंद्र की राजनीतिक इच्छा के अनुसार काम कर रहा है। दूसरी तरफ केंद्र का तर्क हो सकता है कि राज्यपाल संविधान की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
आज की प्रासंगिकता
भारत की राजनीति में गठबंधन सरकारें, दल-बदल, बहुमत के विवाद और केंद्र-राज्य टकराव खत्म नहीं हुए हैं। आज भी जब किसी राज्य में सरकार के बहुमत पर सवाल उठता है, राज्यपाल की भूमिका अचानक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकती है।
1989 के कर्नाटक संकट और 1994 के एस.आर. बोम्मई फैसले के बाद राजनीतिक और संवैधानिक माहौल बदल चुका है। अब किसी राज्य सरकार को हटाने का सवाल केवल राजभवन की रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहता। उस पर अदालत की नजर भी हो सकती है।