राज्यसभा में भाजपा की ऐतिहासिक बढ़त: दलबदल की रणनीति का असर
भारतीय राजनीति में नया मोड़
भारतीय राजनीति के इतिहास में चार दशकों के बाद एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है। राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली बार पूर्ण बहुमत के करीब पहुंच गई है। पिछले 40 वर्षों में यह पहला अवसर है जब कोई पार्टी ऊपरी सदन में इस तरह से प्रभावी हुई है। भाजपा की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे उसकी दोतरफा 'माइक्रो-मैनेजमेंट' रणनीति है, जिसे राजनीतिक हलकों में 'थोक और फुटकर' दलबदल के रूप में जाना जा रहा है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन सांसदों का पाला बदलना इसी रणनीति का एक उदाहरण है।
दलबदल कानून को मात देने की रणनीति
संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से बचते हुए राज्यसभा में अपनी ताकत बढ़ाना भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए पार्टी दो अलग-अलग तरीकों का सहारा लेती है:
थोक दलबदल (पूर्ण विलय): जिन विपक्षी दलों में असंतोष होता है, वहां दो-तिहाई सांसदों को एकजुट कर सीधे भाजपा में विलय करा दिया जाता है। जैसे कि टीडीपी के 4 सांसदों और हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 में से 7 सांसदों के मामले में देखा गया। इसमें सदस्यता जाने का कोई खतरा नहीं रहता।
फुटकर दलबदल (इस्तीफा और उपचुनाव): जहां दो-तिहाई संख्या बल नहीं जुट पाता, वहां विपक्षी सांसदों से व्यक्तिगत तौर पर इस्तीफा दिलाया जाता है। इस रणनीति के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस्तीफा देने वाला सांसद उसी राज्य से हो जहां भाजपा की सरकार है, ताकि खाली हुई सीट पर होने वाले उपचुनाव में उसे भाजपा के टिकट पर दोबारा जिताकर सदन में भेजा जा सके। राज्यसभा उपचुनावों में विधानसभा के संख्या बल के चलते सत्ताधारी दल की जीत निश्चित होती है।
नक्सल विरोधी अभियानों से अनुच्छेद 370 तक का सफर
यह रणनीति 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने के समय से ही बेहद प्रभावी रही है। कांग्रेस के भुवनेश्वर कलीता और संजय सिंह, समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर, सुरेंद्र सिंह नागर और संजय सेठ से लेकर बीजू जनता दल (BJD) के कई प्रमुख नेताओं ने इसी 'इस्तीफा और वापसी' के फॉर्मूले के तहत भाजपा का दामन थामा। हालिया घटनाक्रम में टीएमसी से आए सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बारीक को 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव के लिए भाजपा ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है।
आंकड़ों का नया गणित: बहुमत से मात्र 6 कदम दूर
24 जुलाई के उपचुनावों के बाद राज्यसभा में अकेले भाजपा के सदस्यों की संख्या 117 तक पहुंचने की संभावना है, जो इसके इतिहास में सबसे अधिक होगी।
| श्रेणी | सांसदों की संख्या | बहुमत का समीकरण |
| अकेले भाजपा | 117 | साधारण बहुमत (123) से मात्र 6 सीटें दूर |
| मनोनित व निर्दलीय सहयोग | 127 | साधारण बहुमत का आंकड़ा पार |
| NDA (सहयोगी दलों सहित) | 153 | दो-तिहाई बहुमत (164) से महज 11 सीटें दूर |
देश के 17 राज्यों में अपनी और 22 राज्यों में गठबंधन की सरकार होने का सीधा लाभ भाजपा को मिल रहा है, जिससे विपक्ष का किला लगातार कमजोर होता जा रहा है।