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राम रहीम की पैरोल: कानून या विशेषाधिकार?

गुरमीत राम रहीम की बार-बार मिलने वाली पैरोल ने कानून की समानता पर सवाल उठाए हैं। क्या यह एक विशेषाधिकार है या कानूनी प्रावधान? जानें इस विवाद की गहराई और इसके पीछे के राजनीतिक संदर्भ। राम रहीम की रिहाई पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है और यह न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़ा करती है। क्या समाज को इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए?
 

पैरोल का सवाल


क्या पैरोल का प्रावधान कानून के तहत है या इसे विशेषाधिकार माना जाना चाहिए? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के अनुसार, कैदियों को पैरोल और फरलो का अधिकार है। इस कानून के तहत, एक साल की सजा पूरी करने के बाद, हर कैदी को प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो मिलती है। राम रहीम को 2020 से 2026 के बीच 16 बार से अधिक पैरोल और फरलो मिल चुकी है, जिससे वे कुल 430 से अधिक दिन जेल से बाहर रहे हैं।


कानून की समानता का सिद्धांत

भारत में कानून की समानता का सिद्धांत संविधान का मूल आधार है। अनुच्छेद 14 के अनुसार, सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समान माना जाता है। लेकिन वास्तविकता में यह सिद्धांत अक्सर चुनौती में रहता है। बलात्कार और हत्या के मामलों में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह का मामला इस बात का स्पष्ट उदाहरण है। रोहतक की सुनारिया जेल, जहां वे बंद हैं, उनके लिए लगभग होटल जैसी सुविधाओं का केंद्र बन गई है, जबकि अन्य कैदी कठिन परिस्थितियों में सजा काटते हैं।


विशेष सुविधाएं और आरोप

2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में 20 वर्ष की सजा पाने के बाद, राम रहीम रोहतक जेल में बंद हैं। उन्हें विशेष सेल, बोतलबंद पानी, सहायक कर्मी और अन्य सुविधाएं प्रदान की गई हैं। एक पूर्व कैदी ने आरोप लगाया कि राम रहीम को अन्य कैदियों की तुलना में अधिक समय मुलाकात के लिए मिलता है। जबकि सामान्य कैदियों को केवल 20 मिनट मिलते हैं, राम रहीम को घंटों की छूट दी जाती रही।


पैरोल का दुरुपयोग

जेल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन राम रहीम को बार-बार मिलने वाली पैरोल और फरलो ने संदेह को बढ़ा दिया है। रोहतक जेल में उनका रहना आम कैदियों के लिए कठिनाइयों के बीच विपरीत तस्वीर पेश करता है। सामान्य कैदी भीड़भाड़, सीमित संसाधनों और सख्त नियमों में रहते हैं, जबकि राम रहीम को लगातार रिहाई और आरामदायक व्यवस्था मिलती रही।


राजनीतिक संदर्भ

राम रहीम की बार-बार रिहाई पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है। 2017 में सजा के बाद हुए दंगों में 40 लोगों की मौत हुई थी। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति समेत कई संगठन इन पैरोलों की निंदा करते हैं। पत्रकार अंशुल छत्रपति ने इसे "कानून का मजाक" बताया है। हरियाणा के आंकड़ों के अनुसार, जेलों में हजारों कैदी हैं, लेकिन सीमित संख्या को ही ऐसी छूट मिलती है।


जेल सुधार की आवश्यकता

रोहतक की सुनारिया जेल सामान्य रूप से क्षमता से अधिक भरी रहती है। कैदियों को बुनियादी सुविधाएं भी मुश्किल से मिलती हैं। लेकिन राम रहीम के लिए यहां विशेष इंतजाम किए जाते रहे हैं। यह जेल उनके लिए सजा की जगह आरामगाह बन गई है। पैरोल और फरलो जैसे प्रावधानों का उद्देश्य पुनर्वास है, न कि दुरुपयोग। इसलिए पुलिस प्रशासन और सरकार को इनमें पारदर्शिता लानी चाहिए।


समाज की जिम्मेदारी

गुरमीत राम रहीम जैसे प्रभावशाली अपराधियों को मिलने वाले ऐशो-आराम का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। समाज को इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी होगी ताकि कानून वाकई सबके लिए समान हो। राम रहीम की लगातार रिहाइयां न केवल पीड़ितों का अपमान हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र पर सवालिया निशान लगाती हैं।