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लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि पर छात्रों का विरोध, एमएलसी ने की कार्रवाई की मांग

लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि के खिलाफ छात्रों ने एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह से मुलाकात की और प्रशासन की दमनात्मक नीतियों का विरोध किया। एमएलसी ने फीस वृद्धि को गरीब छात्रों के खिलाफ बताया और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की। छात्रों का धरना शांतिपूर्ण था, लेकिन प्रशासन ने बिना किसी कारण के छात्रों को हिरासत में लिया। यह घटना शिक्षा के बाजारीकरण और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले का प्रतीक है। जानें इस मुद्दे पर छात्रों और प्रशासन के बीच क्या हो रहा है।
 

छात्र नेताओं की एमएलसी से मुलाकात

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस में वृद्धि और उसके साथ हो रही धांधली के खिलाफ छात्र नेताओं ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद, एमएलसी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जय प्रकाश सैनी को फोन कर स्पष्ट किया कि यह फीस वृद्धि छात्रों के हित में नहीं है। उन्होंने कहा कि यह वृद्धि गरीब और वंचित छात्रों को दबाने का प्रयास है।


धरने का आयोजन और प्रशासन की कार्रवाई

उन्होंने कहा कि इस तरह का मॉडल केवल धन कमाने के लिए लागू किया जा रहा है, जिसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। अन्यथा, वह छात्र नेताओं के साथ धरने पर बैठेंगे। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र और विभिन्न छात्र संगठनों के प्रतिनिधि, जैसे आइसा, एनएसयूआई और एससीएस, फीस वृद्धि और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ गेट संख्या 1 पर शांतिपूर्ण धरने के लिए एकत्र हुए। धरना शुरू होने से पहले ही, प्रॉक्टर राकेश द्विवेदी के निर्देश पर पुलिस को बुलाकर छात्रों को हिरासत में ले लिया गया। यह एक सुनियोजित दमनात्मक कार्रवाई थी, जिसका उद्देश्य छात्रों के विरोध को शुरू होने से पहले ही कुचलना था।


प्रशासन की दमनात्मक नीतियाँ

यह घटना एक स्पष्ट पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर को लोकतांत्रिक संवाद के स्थान से दमन और भय के वातावरण में बदल दिया है। वही प्रॉक्टर जो शांतिपूर्ण विरोध कर रहे छात्रों को हिरासत में लेने का आदेश देते हैं, वही परिसर में सक्रिय एबीवीपी से जुड़े हिंसक तत्वों को संरक्षण देते हैं। शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों पर हमलों की घटनाएँ इसी संरक्षण के तहत होती हैं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक पक्षधरता भी है।


शिक्षा का बाजारीकरण

यह दमन उस व्यापक राजनीतिक परियोजना से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत सार्वजनिक शिक्षा को बाज़ार के हवाले किया जा रहा है। हाल ही में विश्वविद्यालय में फीस में भारी वृद्धि और स्व-वित्तपोषित सीटों का विस्तार इसी प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें कई पाठ्यक्रमों में फीस में 40 प्रतिशत से लेकर 200 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। यह प्रक्रिया राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत आगे बढ़ाई जा रही है, जहाँ विश्वविद्यालयों को अपने संसाधन स्वयं जुटाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि शिक्षा को अधिकार के बजाय एक खरीदी जाने वाली वस्तु में बदल दिया गया है।


छात्रों का संघर्ष

जब छात्र इन नीतियों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें दमन का सामना करना पड़ता है। हाल ही में, जब छात्रों ने फीस वृद्धि के मुद्दे पर कुलपति से जवाब माँगने की कोशिश की, तो उन्होंने संवाद से बचते हुए परिसर छोड़ना उचित समझा। यह प्रशासन की उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें जवाबदेही से बचना और विरोध को दबाना प्राथमिकता बन चुका है।


सामाजिक प्रभाव

इस पूरे परिदृश्य का सामाजिक प्रभाव गहरा है। फीस वृद्धि और स्व-वित्तपोषित मॉडल का विस्तार दलित, बहुजन, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाओं, क्वीयर, ग्रामीण और प्रथम-पीढ़ी के शिक्षार्थियों को सबसे अधिक प्रभावित करता है। यह केवल आर्थिक बोझ नहीं बढ़ाता, बल्कि उच्च शिक्षा में प्रवेश और निरंतरता को सीमित करता है। ऐसे समय में जब पहले से ही नामांकन में गिरावट देखी जा रही है, यह नीति बहिष्करण को और तेज करती है।


छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया

आइसा लखनऊ विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष शान्तम ने कहा कि छात्रों को बिना किसी कारण हिरासत में लेना यह दिखाता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन के पास जवाब नहीं हैं। एनएसयूआई के राष्ट्रीय समन्वयक प्रिंस प्रकाश ने कहा कि यह केवल एक परिसर का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देशभर में शिक्षा के निजीकरण की दिशा को दिखाता है। एससीएस के तौकील ग़ाज़ी ने कहा कि यह अस्वीकार्य है और इसका हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।


भविष्य की चुनौतियाँ

यदि इस प्रकार की दमनात्मक कार्रवाइयाँ जारी रहती हैं और फीस वृद्धि जैसे निर्णय वापस नहीं लिए जाते, तो यह संघर्ष और व्यापक होगा और विश्वविद्यालय परिसर से बाहर तक फैलेगा। यह लड़ाई केवल फीस के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र को बचाने की लड़ाई है।