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लद्दाख में पानी की कमी से निपटने के लिए 'आइस स्तूप' प्रोजेक्ट में नई तकनीक का समावेश

लद्दाख में पानी की कमी को दूर करने के लिए सोनम वांगचुक के आइस स्तूप प्रोजेक्ट में नई तकनीक का समावेश किया जा रहा है। 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स' द्वारा आयोजित होने वाले हैकाथॉन में स्मार्ट सेंसर्स और ऑटोमेशन का उपयोग किया जाएगा। यह तकनीक सर्दियों में पानी को बर्फ में बदलने की प्रक्रिया को स्वचालित और सटीक बनाएगी, जिससे किसानों को गर्मियों में पानी की बेहतर उपलब्धता होगी। जानें कैसे यह प्रोजेक्ट लद्दाख के किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।
 

आइस स्तूप प्रोजेक्ट में सुधार

जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में पानी की कमी को दूर करने के लिए इंजीनियर सोनम वांगचुक के 'आइस स्तूप' प्रोजेक्ट में नवीनतम सुधार किए जा रहे हैं। 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख' जुलाई 2026 में 'हैकाथॉन' नामक एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है, जिसका उद्देश्य 'आइस स्तूप' निर्माण प्रक्रिया में स्मार्ट सेंसर्स और ऑटोमेशन जैसी तकनीकों का समावेश करना है। इससे सर्दियों में पहाड़ों से आने वाले पानी को बर्फ के टावर में बदलने की प्रक्रिया स्वचालित और सटीक हो जाएगी। कुछ स्टार्टअप्स भी इस दिशा में काम कर रहे हैं ताकि पानी को इकट्ठा करने के तरीकों को और बेहतर बनाया जा सके। यह परिवर्तन लद्दाख के किसानों के लिए गर्मियों में पानी की उपलब्धता को और अधिक सुनिश्चित करेगा।


लद्दाख का जलवायु और पानी की कमी

लद्दाख एक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, जहां का मौसम अत्यंत ठंडा होता है। यहां अधिकांश समय बर्फबारी होती है, और पानी का मुख्य स्रोत पहाड़ों पर जमी बर्फ है। गर्मियों में बर्फ का पिघलना देर से होता है, जिससे पानी की कमी होती है। इसके अलावा, सर्दियों में बहने वाला पानी अक्सर बेकार चला जाता है।


खेती के लिए जल की आवश्यकता

लद्दाख के निवासी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं, जहां किसान जौ, सेब और अन्य फसलें उगाते हैं। पहले, किसान बर्फ के पिघलने का इंतजार करते थे, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ कम हो रही है, जिससे पानी की कमी बढ़ गई है।


आइस स्तूप का निर्माण

सोनम वांगचुक ने 2014-15 में 'आइस स्तूप' का निर्माण शुरू किया, जिसका उद्देश्य सर्दियों में बहने वाले फालतू पानी को रोककर गर्मियों में उपयोग करना था। यह बर्फ का एक ऊंचा टावर होता है, जिसमें पाइप के माध्यम से पानी को फव्वारे के रूप में छोड़ा जाता है, जिससे वह बर्फ में बदल जाता है। इसका तिकोना आकार सूरज की रोशनी को कम सोखता है, जिससे बर्फ गर्मियों तक धीरे-धीरे पिघलती है।


गांव वालों का सहयोग

सोनम वांगचुक ने इस तकनीक का पहला परीक्षण अपने छात्रों के साथ किया। सफल प्रयोग के बाद, लद्दाख के कई गांवों ने इस विधि को अपनाया। कई संस्थाओं ने पाइप और श्रमिकों की सहायता प्रदान की है। अब तक इस क्षेत्र में 12 से अधिक आर्टिफिशियल बर्फ के टावर बनाए जा चुके हैं, जिससे गांवों को करोड़ों लीटर पानी प्राप्त हुआ है।


वैश्विक मान्यता

सोनम वांगचुक के इस प्रयास को विश्व स्तर पर सराहा गया है। 2016 में उन्हें 'रोलेक्स अवार्ड' से सम्मानित किया गया, जिसने उनके इस तरीके को अन्य देशों में भी फैलाने में मदद की, जहां पानी की कमी है। उनका यह तरीका सस्ता है और बिना बिजली के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करता है। यह कार्य हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ मिलकर काम करना सबसे प्रभावी तरीका है।