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लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को मिली बड़ी पदोन्नति, मालेगांव मामले में मिली क्लीन चिट

भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को मालेगांव बम विस्फोट मामले में क्लीन चिट मिलने के बाद ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत किया है। यह निर्णय सशस्त्र बल न्यायाधिकरण द्वारा उनके रिटायरमेंट पर रोक लगाए जाने के बाद आया। पुरोहित ने न्यायाधिकरण में अपनी दलील में कहा कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया था, जिससे उनके करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। एनआईए अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
 

नई दिल्ली से बड़ी खबर

नई दिल्ली: भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत करने का निर्णय लिया है। यह प्रमोशन 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में हाल ही में मिली क्लीन चिट के बाद हुआ है। यह महत्वपूर्ण निर्णय सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) द्वारा पुरोहित के रिटायरमेंट पर रोक लगाए जाने के तुरंत बाद आया है। उल्लेखनीय है कि पुरोहित 31 मार्च 2026 को रिटायर होने वाले थे।


सूत्रों के अनुसार, पुरोहित ने अपने रुके हुए प्रमोशन और अन्य सेवा लाभों की बहाली के लिए न्यायाधिकरण का सहारा लिया था। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि जब तक उनकी वैधानिक शिकायत पर कोई अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक उनके रिटायरमेंट पर रोक लागू रहेगी।


ट्रिब्यूनल में दी गई दलील

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) में कहा कि मालेगांव ब्लास्ट मामले में उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया था, जिससे उनके सैन्य करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अदालत ने हाल ही में उन्हें पूरी तरह निर्दोष करार दिया है। उन्होंने ट्रिब्यूनल को बताया कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन और अवसर नहीं मिल सके, जिसके वे हकदार थे।


एनआईए कोर्ट का फैसला

31 जुलाई को मुंबई की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अदालत ने लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य को मालेगांव ब्लास्ट मामले में दोषमुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा कि सरकारी वकील आरोपों को साबित करने में असफल रहे हैं। इस मामले में शुरू में 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन अंततः केवल सात लोगों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे।


2008 का मालेगांव बम विस्फोट

मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास हुए बम विस्फोट ने छह लोगों की जान ले ली थी और 95 अन्य घायल हुए थे। इस घटना की प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने की थी, लेकिन 2011 में इसे एनआईए को सौंप दिया गया। अदालत ने सभी आरोपियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और अन्य धाराओं से बरी कर दिया।