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विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पर विपक्ष का तीखा विरोध

विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 ने संसद में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्षी सांसदों ने इस विधेयक की कड़ी आलोचना की है, आरोप लगाते हुए कि यह सरकार द्वारा संस्थानों पर नियंत्रण को और अधिक केंद्रीकृत करने का प्रयास है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सांसदों ने इसे जन कल्याण के बजाय कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देने वाला बताया है। इस विधेयक के खिलाफ तीव्र विरोध हो रहा है, जिसमें सांसदों ने इसे वापस लेने की मांग की है।
 

विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 का विवाद


नई दिल्ली। बुधवार को विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 ने संसद में एक बड़ा राजनीतिक विवाद उत्पन्न कर दिया। कई विपक्षी सांसदों ने इस विधेयक की तीखी आलोचना की, आरोप लगाते हुए कि यह केंद्र सरकार द्वारा संस्थानों पर नियंत्रण को और अधिक केंद्रीकृत करने का प्रयास है। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में एकरूपता थोपना है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि सभी संस्थान उनके अनुसार कार्य करें, इसलिए यह संशोधन लाया गया है।


कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने कहा कि यह विधेयक बुलडोज़र राज को कानूनी रूप देने का एक उदाहरण है। सपा सांसद राम गोपाल यादव ने भी सरकार के विधायी दृष्टिकोण की आलोचना की, यह कहते हुए कि वर्तमान शासन के तहत लाए गए सभी विधेयक जन कल्याण के बजाय कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि अब तक लाए गए सभी विधेयक जनता के खिलाफ रहे हैं और यह विधेयक भी उसी श्रेणी में आता है। उन्होंने इसे कल्याण के नाम पर जनता से पैसे वसूलने की एक चाल बताया।


कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने इसे एक कठोर कानून करार दिया, जो अल्पसंख्यकों और NGOs पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक विदेशी फंडिंग नियमों में संशोधन करने के उद्देश्य से लाया गया है, जिसके खिलाफ तीव्र विरोध हो रहा है। ईडन ने कहा कि यह कानून न केवल अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि भारत में कई NGOs के कार्यों में भी बाधा डालेगा। उन्होंने इस विधेयक के खिलाफ कड़ी निंदा की और इसे वापस लेने की मांग की।