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वैश्विक खुशियों की रिपोर्ट: स्कैंडिनेविया के देशों का अद्वितीय मॉडल

हाल ही में जारी एक वैश्विक रिपोर्ट में 143 देशों के नागरिकों की खुशियों की तुलना की गई है। फ़िनलैंड लगातार खुशियों का शीर्ष स्थान बनाए हुए है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे एंग्लोस्फीयर देशों में प्रसन्नता में कमी आई है। भारत की स्थिति भी चिंताजनक है, जहां 140 करोड़ की आबादी 116वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट में स्कैंडिनेवियाई देशों की राजनीति और समाज की विशेषताएँ उजागर की गई हैं, जो मानवता की सेवा करती हैं। जानें, क्यों ये देश खुशहाल हैं और कैसे संवाद का महत्व है।
 

वैश्विक खुशियों की तस्वीर

हाल ही में 143 देशों के नागरिकों की 'खुशी' और 'प्रसन्नता' की तुलना पर आधारित एक वैश्विक रिपोर्ट सामने आई है। यह रिपोर्ट 2024-2025 की स्थिति को दर्शाती है। क्या है इस रिपोर्ट की कहानी? वही जो पिछले एक दशक से दुनिया देख रही है! फ़िनलैंड लगातार आठ-नौ वर्षों से खुशियों का शीर्ष स्थान बनाए हुए है। इसके बाद डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, आइसलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों का स्थान है। इसके अलावा नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग और स्विट्ज़रलैंड भी इस सूची में शामिल हैं। इज़राइल का नाम भी है, जो थोड़ा आश्चर्यजनक है क्योंकि वहां 2024-25 में हमास के साथ संघर्ष चल रहा था। शायद इज़राइली लोग इसीलिए खुश हैं क्योंकि उन्होंने हमास-फिलिस्तीनियों को पराजित किया है।


दुखों की दुनिया

एक गंभीर सत्य यह है कि एंग्लोस्फीयर देशों, जैसे अमेरिका और ब्रिटेन, में लोगों की 'प्रसन्नता' में कमी आई है। भारत की बात करें तो हमारी 140 करोड़ की आबादी 116वें स्थान पर है, जो कि नरक देशों जैसे अफ़गानिस्तान और ज़िम्बाब्वे से थोड़ी ऊपर है। यह सब केकड़ा छाप राजनीति का परिणाम है। केकड़े एक-दूसरे को नीचे खींचने की प्रवृत्ति रखते हैं। यदि इन्हें एक टोकरी में रखा जाए, तो कोई भी बाहर नहीं निकल पाता।


राजनीति का प्रभाव

अमेरिका में ट्रंप के शासनकाल ने देश को एक टोकरी में बदल दिया है, जहां हर कोई एक-दूसरे को नीचे खींचने में लगा है। इसी तरह, मोदीकालीन भारत में भी राजनीति ने समाज को एक टोकरी में बदल दिया है। ऐसे माहौल में खुशी और आनंद की कल्पना कैसे की जा सकती है? जबकि स्कैंडिनेवियाई देशों में राजनीति मानवता की सेवा करती है, न कि केकड़ों की तरह।


संवाद का महत्व

फ़िनलैंड और स्वीडन में नेता इस भावना के साथ जीते हैं कि वे कॉफी-हाउस में बैठकर विचारों का आदान-प्रदान करें। यह संवाद बिना किसी भय के होता है। युर्गेन हाबर्मास ने कहा था कि कॉफी-हाउस कभी लोकतंत्र की प्रयोगशाला थे। लेकिन अब राजनीतिक दलों और मीडिया ने इस सार्वजनिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है।


खुशहाल देशों की विशेषताएँ

दुनिया के शीर्ष दस खुश देशों में कोई भी भूखा या भयाकुल नहीं है। इन देशों के नागरिक अपनी मातृभाषा में पढ़ते हैं और शिक्षित होते हैं। ये सभी मौलिक सृजन में विश्वास रखते हैं। इन देशों की कंपनियाँ, जैसे कि Maersk और लेगो, वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं।