संसद का मानसून सत्र: हंगामे में बर्बाद हुआ समय
संसद का मानसून सत्र 2026
इस बार संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई 2026 से आरंभ होकर 13 अगस्त 2026 तक चला। आंकड़ों के अनुसार, पिछले 22 वर्षों में केवल दो सत्र ऐसे रहे हैं जो इससे भी खराब रहे हैं। इससे पहले, शीतकालीन सत्र 2010 में केवल 5 प्रतिशत और शीतकालीन सत्र 2013 में 8 प्रतिशत कार्य हुआ था। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, इस बार मानसून सत्र में लोकसभा में निर्धारित समय का केवल 15 प्रतिशत काम हुआ। वहीं, राज्यसभा में स्थिति थोड़ी बेहतर रही, जहां 33 प्रतिशत समय का उपयोग कार्य के लिए किया गया। शेष समय हंगामे और नारेबाजी में बर्बाद हो गया।
प्रश्नकाल का समय भी बर्बाद
इस सत्र में प्रश्नकाल का समय भी निराशाजनक रहा। संसद में हर दिन एक निर्धारित समय होता है, जिसे प्रश्नकाल कहा जाता है, जहां सांसद सीधे सरकार से सवाल पूछ सकते हैं। लोकसभा में कुल 380 सवाल पूछे जाने थे, लेकिन केवल 2 सवालों के ही मौखिक उत्तर दिए गए। राज्यसभा में भी 285 सवालों में से सिर्फ 16 सवालों का जवाब मिला।
छात्र आंदोलन का प्रभाव
मानसून सत्र 25 दिनों तक चला और इसमें 19 बैठकें हुईं। शुरुआत से ही सदन में हंगामा जारी रहा, जिसका मुख्य कारण छात्र आंदोलन था। विपक्ष ने NEET-UG पेपर लीक और छात्रों के आंदोलन पर चर्चा की मांग की, लेकिन सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन पाई। इसके अलावा, राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के मामले में भी सदन में हंगामा हुआ। पहले हफ्ते में लोकसभा में केवल 5 प्रतिशत और राज्यसभा में 6 प्रतिशत कार्य हो सका।
सत्र के दौरान विधेयकों की स्थिति
सत्र के दौरान रोजाना हंगामे के कारण सदन बार-बार स्थगित होता रहा। केवल 28-29 जुलाई को ही कुछ कामकाज हुआ, जिसमें 28 जुलाई को लगभग 9 घंटे का कार्य हुआ। कुल 12 विधेयक पेश किए गए, जिनमें से 9 विधेयकों पर मंत्री के अलावा किसी सांसद ने चर्चा नहीं की। केवल पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर लगभग 11 घंटे की विस्तृत चर्चा हुई।
सरकार के आंकड़ों में अंतर
सरकार के आंकड़े इससे थोड़े भिन्न हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत बताई। यह अंतर गणना के तरीकों में भिन्नता के कारण है, लेकिन दोनों ही आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि सत्र अत्यधिक कम उत्पादक रहा।
संसद की कार्यवाही का खर्च
संसद चलाना एक महंगा कार्य है, जिसमें सांसदों के साथ सचिवालय, सुरक्षा, तकनीकी सुविधाएं, अनुवाद और कर्मचारियों का खर्च शामिल होता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने 2012 में बताया था कि दोनों सदनों की कार्यवाही पर लगभग ₹2.5 लाख प्रति मिनट खर्च होता है। एक घंटे की कार्यवाही की लागत लगभग ₹1.5 करोड़ होती है। हालांकि, यह आंकड़ा पुराना है और आज खर्च अधिक हो सकता है।
सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप
संसद के मानसून सत्र के समाप्त होने के बाद, बीजेपी और विपक्ष ने एक-दूसरे पर सदन की कार्यवाही ठप करने का आरोप लगाया। बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी को अपरिपक्व और अनुशासनहीन बताया, आरोप लगाते हुए कहा कि उनके रवैये के कारण पूरा मानसून सत्र प्रभावित हुआ।
वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर संसद को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में आकर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। खरगे ने आरोप लगाया कि सरकार संसद को महत्वहीन बनाना चाहती है।
आगे की राह
सत्र समाप्त होने तक शीतकालीन सत्र 2026 की तारीखों का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है। हालांकि, यह निश्चित है कि इस सत्र में उठे कई मुद्दे, जैसे परिसीमन और FCRA से जुड़े विधेयक, जिन्हें इस मानसून सत्र में टाल दिया गया।