सड़क पर उठे सवाल: नागरिक अधिकारों की मांग और राजनीतिक प्रक्रिया
नागरिकों की आवाज़ और राजनीतिक प्रक्रिया
मजदूर, युवा और मतदाता, ये सभी नागरिक हैं जो व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं। लेकिन व्यवस्था के पास केवल समय है, जबकि नागरिकों के हाथ से अवसर निकलते जा रहे हैं।
एक मजदूर को अपनी मजदूरी की जरूरत है, एक युवा को परीक्षा का न्याय चाहिए, और एक मतदाता को मतदान से पहले अपने नाम की वापसी की आवश्यकता है। 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में मिले आश्वासन अब क्या काम के हैं?
नागरिकों का समय घंटों में खर्च होता है, जबकि संस्थाओं का समय वर्षों में चलता है। यह समय की असमानता ही सत्ता का एक बड़ा अवरोध है।
दिल्ली के जंतर मंतर पर 10 अक्टूबर को हुई लामबंदी ने इस सच्चाई को फिर से उजागर किया है। कॉकरोच जनता पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगा है।
अब सवाल यह है कि इस नए आंदोलन की सफलता को कैसे मापा जाएगा? क्या भीड़ की संख्या, नारे, या नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों से?
फ्रांसीसी विचारक एलेक्सिस द तोकविल ने क्रांति के विरोधाभास को समझने की कोशिश की थी। नए शासकों को पुरानी प्रशासनिक मशीनरी मिली, जिसे उन्होंने बनाए रखा।
सड़क पर आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ होता है, लेकिन संस्थाएं अपनी प्रक्रियाओं के सहारे चलती हैं। इस्तीफा कुछ समय में मिल सकता है, लेकिन प्रक्रिया को बदलने में साल लग सकते हैं।
इरोम शर्मिला का अनशन और राजस्थान का सूचना अधिकार आंदोलन, दोनों ने संघर्ष किया, लेकिन परिणाम अलग रहे।
सड़क सत्ता को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन सुनना, मानना और लागू करना तीन अलग बातें हैं।
जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रही है, लेकिन क्या इससे नागरिकों के अधिकारों में कोई बदलाव आएगा?