सिंधु जल संधि विवाद: भारत की अनुपस्थिति में पाकिस्तान का वित्तीय बोझ
भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि विवाद
नई दिल्ली: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। इस बार का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया है, जिसमें भारत की अनुपस्थिति के बावजूद पाकिस्तान को न केवल अपने खर्च का, बल्कि भारत के हिस्से का भी बोझ उठाना पड़ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अब तक इस प्रक्रिया पर 6 लाख डॉलर (लगभग 5.77 करोड़ रुपये) से अधिक खर्च किया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसमें दोनों देशों के बीच सिंधु नदी प्रणाली के जल बंटवारे के नियम निर्धारित किए गए थे। विवाद की शुरुआत 2016 में हुई, जब भारत ने जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा जलविद्युत परियोजना पर कार्य तेज किया और चिनाब नदी पर रैटल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की घोषणा की। पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं के डिजाइन पर आपत्ति जताते हुए दावा किया कि ये संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।
भारत की दूरी का कारण
भारत का कहना है कि एक ही विवाद पर दो समानांतर प्रक्रियाएं नहीं चल सकतीं और PCA को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। इसी कारण भारत ने 2023 से PCA की कार्यवाही में भाग लेना बंद कर दिया।
इसके बाद, 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया और न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया से भी दूरी बना ली। भारत का स्पष्ट रुख है कि वह इस विवाद से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं में शामिल नहीं होगा।
पाकिस्तान का खर्च क्यों बढ़ा?
भारत के बहिष्कार के बावजूद, पाकिस्तान ने PCA में सुनवाई जारी रखी। जून 2025 में अदालत ने खुद को इस मामले की सुनवाई के लिए सक्षम बताया और कहा कि सिंधु जल संधि को एकतरफा स्थगित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, भारत ने किसी भी सुनवाई में भाग नहीं लिया।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की कार्यवाही का खर्च सामान्यतः दोनों पक्षों द्वारा साझा किया जाता है। लेकिन भारत की गैरमौजूदगी और फीस जमा नहीं करने के कारण पाकिस्तान को पूरी प्रक्रिया का खर्च उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अब तक 6 लाख डॉलर से अधिक खर्च किया है, जिसमें भारत के हिस्से का भुगतान भी शामिल है।
भारत का कहना है कि वह PCA की वैधता को स्वीकार नहीं करता, जबकि पाकिस्तान इस मंच के जरिए अपने दावों को आगे बढ़ाने में जुटा है। ऐसे में सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के बीच कानूनी और कूटनीतिक टकराव अभी जारी रहने के संकेत हैं।