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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग को गर्भपात की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में 15 साल की नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की है और यह स्पष्ट किया है कि प्रजनन संबंधी निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। जानें इस महत्वपूर्ण मामले के सभी पहलुओं के बारे में।
 

महिला की इच्छा का सम्मान करना आवश्यक


सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 15 साल की एक नाबालिग को सात महीने के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी।


बेंच ने स्पष्ट किया कि यह जन्म लेने वाले बच्चे का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि लड़की क्या चाहती है। यदि वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही गोद देने का विकल्प उपलब्ध हो।


कोर्ट ने गोद देने के सुझाव को खारिज किया

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस अवस्था में गर्भपात करना मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है और उन्होंने डिलीवरी के बाद बच्चे को गोद देने का सुझाव दिया। लेकिन कोर्ट ने इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया।


नाबालिग की मां ने याचिका दायर की

लड़की एक नाबालिग लड़के के साथ सहमति से संबंध के बाद गर्भवती हुई थी। उसकी मां ने गर्भपात की अनुमति मांगी थी, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट की समयसीमा से बाहर थी। लड़की ने भी कहा कि वह प्रेग्नेंसी जारी नहीं रखना चाहती।


गर्भावस्था ने मानसिक तनाव बढ़ाया

याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि गर्भावस्था ने नाबालिग को गंभीर मानसिक तनाव में डाल दिया है और उसकी पढ़ाई पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग पहले से ही मानसिक तनाव के संकेत दिखा रही थी और उसने आत्महत्या की कोशिश भी की थी।


कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि बच्चे को गोद दिलाने की व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने इस पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोर्ट महिलाओं को गर्भपात के बजाय आर्थिक मदद या गोद लेने के विकल्पों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।


प्रजनन संबंधी निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा

कोर्ट ने कहा कि किसी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए, उसकी इच्छा का सम्मान करना आवश्यक है।


महिलाओं के हित में निर्णय लेने की आवश्यकता

कोर्ट ने कहा कि यदि अदालतें अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने पर जोर देंगी, तो महिलाएं अवैध गर्भपात केंद्रों का सहारा लेने को मजबूर हो सकती हैं। अंत में, कोर्ट ने नाबालिग का एम्स दिल्ली में सभी आवश्यक सावधानियों के साथ गर्भपात कराने का निर्देश दिया।