सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विवाह-पूर्व शारीरिक संबंध सामान्य हैं
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने विवाह-पूर्व शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के नैतिक चरित्र का मापदंड नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी से पहले सहमति से बने 'शारीरिक संबंध' किसी के चरित्र पर दाग नहीं लगा सकते।
मामले का विवरण
जस्टिस मनोज मिश्रा और मनमोहन की पीठ ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने उम्मीदवार गजुला तिरुपति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए भर्ती बोर्ड के निर्णय पर सवाल उठाए।
क्या हुआ था?
गजुला तिरुपति का चयन पुलिस कांस्टेबल पद के लिए किया गया था, लेकिन बाद में उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। भर्ती बोर्ड का कहना था कि वह पहले एक आपराधिक मामले में आरोपी रह चुका है। आरोप था कि उसने एक युवती से विवाह का वादा कर उसके साथ संबंध बनाए, लेकिन बाद में किसी अन्य महिला से शादी कर ली। हालांकि, यह मामला 2015 में लोक अदालत के माध्यम से समझौते के बाद समाप्त हो गया था। उम्मीदवार ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान इस मामले की जानकारी स्वयं सत्यापन फॉर्म में दी थी और उस पर किसी तथ्य को छिपाने का आरोप नहीं था।
भर्ती बोर्ड की दलील पर अदालत की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन करना नियोक्ता का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए। अदालत ने पाया कि भर्ती बोर्ड ने बिना पर्याप्त आधार के यह मान लिया था कि लोक अदालत में हुआ समझौता अपराध स्वीकार करने के समान है। पीठ ने कहा कि आज के सामाजिक परिवेश में दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध असामान्य नहीं हैं। ऐसे संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र या नैतिकता के खिलाफ प्रमाण के रूप में नहीं देखा जा सकता।
प्रेम संबंधों की वास्तविकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के माहौल में शादी से पहले शारीरिक संबंध सामान्य बात है और हर प्रेम संबंध विवाह तक नहीं पहुंचता। केवल इसलिए कि किसी रिश्ते का अंत शादी में नहीं हुआ, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है या उसका चरित्र संदिग्ध है। अदालत ने भर्ती बोर्ड की स्क्रीनिंग समिति के निर्णय को मनमाना करार देते हुए उम्मीदवार के पक्ष में फैसला सुनाया। साथ ही, उसकी नियुक्ति के मामले पर पुनर्विचार करने और संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और वयस्कों के आपसी सहमति से बने संबंधों के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।