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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हिमाचल को 20 वर्षों में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश को 20 वर्षों में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देने का आदेश दिया है, जिससे पंजाब और हरियाणा के साथ 60 साल पुराना विवाद समाप्त हो गया है। यह निर्णय तीन राज्यों के बीच बिजली हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने में मदद करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिजली का निर्धारण 2011 के फैसले के आधार पर होगा, और इस समझौते में पूंजीगत खर्च का समायोजन भी शामिल है। जानें इस महत्वपूर्ण फैसले के सभी पहलुओं के बारे में।
 

हिमाचल प्रदेश बिजली विवाद का समाधान


हिमाचल प्रदेश बिजली विवाद: पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) से संबंधित लगभग 60 साल पुराना बिजली विवाद अब समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस मामले में महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए केंद्र सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके अनुसार हिमाचल प्रदेश को बिजली के बकाये का भुगतान नकद के बजाय बिजली के रूप में किया जाएगा। अदालत के आदेश के अनुसार, पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली प्रदान करेंगे। यह विवाद 1966 से हिमाचल प्रदेश की बिजली हिस्सेदारी को लेकर चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने तीनों राज्यों के बीच लंबे समय से अटके भुगतान को सुलझाने का मार्ग प्रशस्त किया है।


सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली बिजली का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट के 27 सितंबर 2011 के निर्णय के आधार पर होगा। इस व्यवस्था के तहत, पंजाब और हरियाणा को अगले 20 वर्षों में हर साल औसतन लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली प्रदान करनी होगी। यह बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच कम उत्पादन वाले मौसम में उपलब्ध कराई जाएगी। केंद्र सरकार ने पहले 15 वर्षों में बकाया चुकाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन पंजाब ने 30 साल का समय मांगा था। वहीं, हिमाचल प्रदेश चाहता था कि उसे 10 वर्षों के भीतर पूरा बकाया मिल जाए। तीनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल की समयसीमा तय की।


पूंजीगत खर्च का समायोजन

इस समझौते में बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान पंजाब और हरियाणा द्वारा किए गए ऐतिहासिक पूंजीगत खर्च को भी ध्यान में रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की पूंजीगत लागत की देनदारी 420.77 करोड़ रुपये निर्धारित की है। इस राशि का समायोजन 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली के बकाये में किया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप, हिमाचल प्रदेश की मूल बिजली हिस्सेदारी 13,066 मिलियन यूनिट से घटकर लगभग 11,973 मिलियन यूनिट रह गई है। लगभग 1,093 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर राशि का समायोजन किया जाएगा। हालांकि, हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली प्रत्येक बिजली की किस्त पर संबंधित वर्ष के लिए BBMB द्वारा निर्धारित शुल्क भी देना होगा। इस व्यवस्था से विवाद समाप्त करने में मदद मिलेगी।


राज्यों की हिस्सेदारी का निर्धारण

इस विवाद की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के गठन और पंजाब पुनर्गठन के बाद बिजली के बंटवारे को लेकर हुई थी। हिमाचल प्रदेश ने वर्ष 1996 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर कर भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सेदारी की मांग की थी। 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का हकदार माना। उस निर्णय के अनुसार, पंजाब को 51.80 प्रतिशत, हरियाणा को 37.51 प्रतिशत और चंडीगढ़ को 3.50 प्रतिशत बिजली हिस्सेदारी निर्धारित की गई थी। हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा परियोजना से 1 नवंबर 1966, देहर परियोजना से नवंबर 1977 और पोंग बांध परियोजना से जनवरी 1978 से बिजली हिस्सेदारी का अधिकार मिला था। हालांकि, पुराने बकाये की गणना, भुगतान के तरीके और पूंजीगत लागत को लेकर विवाद जारी रहा।