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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को नहीं रोका जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि धार्मिक कार्यों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सेक्युलर गतिविधि प्रभावित होती है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। इस निर्णय का संबंध केरल के सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं से है। जानें इस मामले में और क्या कहा गया है और इसके पीछे की कानूनी दलीलें क्या हैं।
 

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी


सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक कार्यों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय को अपनी पूजा के तरीके में स्वतंत्रता है, और वह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। हालांकि, यदि कोई सेक्युलर गतिविधि प्रभावित होती है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई।


सरकार का हस्तक्षेप

हिंदू धर्म आचार्य सभा के वकील अक्षय नागराजन ने कोर्ट में कहा कि सरकार आर्टिकल 25(2)(ए) के तहत किसी धार्मिक समुदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। संविधान का यह आर्टिकल राज्य को धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार देता है।


नागराजन ने यह भी बताया कि आर्टिकल 25 के तहत सुरक्षा केवल धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था के बाहरी रूपों जैसे पूजा के रीति-रिवाजों और समारोहों तक भी फैली हुई है।


सेक्युलर गतिविधियों पर प्रभाव

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि कोई सेक्युलर गतिविधि धार्मिक गतिविधियों से प्रभावित होती है, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है। एडवोकेट निजाम पाशा ने मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर चर्चा करते हुए कहा कि धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं होता।


पाशा ने यह भी कहा कि किसी मोहल्ले की मस्जिद खुली हो, फिर भी वहां धार्मिक मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है।


महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश

पिछली सुनवाई में आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था कि इस्लाम महिलाओं को मस्जिद में नमाज के लिए आने से नहीं रोकता, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर इबादत करें।