सुप्रीम कोर्ट का पुलिस और मीडिया के बीच सूचना नीति पर निर्देश
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली: पुलिस और मीडिया के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर उठ रहे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए एक स्पष्ट और जिम्मेदार नीति विकसित करें। यह नीति अदालत के अमीकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन द्वारा तैयार किए गए मैनुअल के आधार पर बनाई जाएगी, जिसका उद्देश्य अधिकारों की रक्षा और जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।
राज्य सरकारों के लिए निर्देश
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए एक सिद्धांत आधारित और अधिकारों के अनुकूल ढांचा तैयार करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति जांच की प्रक्रिया को सुरक्षित रखते हुए बनाई जानी चाहिए। राज्यों को इस आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।
PUCL की याचिका से संबंधित मामला
यह आदेश पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया। इसी संगठन की याचिका पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस एनकाउंटर या संदिग्ध गैर-न्यायिक हत्याओं के बाद पालन की जाने वाली 16 अनिवार्य गाइडलाइंस तय की थीं। अदालत ने माना कि मीडिया ब्रीफिंग भी उसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अमीकस द्वारा तैयार मैनुअल
शुरुआत में गृह मंत्रालय को पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए सर्वोत्तम प्रक्रियाओं का मैनुअल तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। बाद में यह कार्य अदालत के अमीकस क्यूरी गोपाल शंकरनारायणन को सौंपा गया। उन्होंने केंद्र सरकार की राय और अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं का अध्ययन कर 'पुलिस मैनुअल फॉर मीडिया ब्रीफिंग' तैयार किया।
राज्यों की उदासीनता पर टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि बार-बार समय देने के बावजूद अधिकांश राज्यों ने इस प्रक्रिया में पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब मामलों को लंबित रखना उचित नहीं है। इसी कारण से राज्यों को सीधे निर्देश दिया गया है कि वे अमीकस द्वारा तैयार मैनुअल को ध्यान में रखते हुए अपनी नीति निर्धारित करें।
मैनुअल की मूल भावना
गोपाल शंकरनारायणन ने अपने मैनुअल में लिखा है कि जनता को समय पर और सही जानकारी देना आवश्यक है। साथ ही, पीड़ितों, गवाहों और आरोपियों की गरिमा, निजता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मैनुअल में कहा गया है कि सोशल मीडिया के युग में गलत सूचना कानून व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है, इसलिए पुलिस केवल सत्यापित और आवश्यक जानकारी ही साझा करे।