सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन का कोई अधिकार नहीं
महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों के पदोन्नति से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पुराने सेवा नियमों के आधार पर पदोन्नति किसी भी नागरिक का अंतर्निहित अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि सरकार आवश्यकता पड़ने पर सेवा नियमों और चयन प्रक्रिया में संशोधन कर सकती है, जब तक कि वह निर्णय को ओवरराइड न करे।
सरकारी नीतियों का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ओडिशा सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए कहा कि चयन और पदोन्नति की प्रक्रिया निर्धारित करना सरकार का नीतिगत अधिकार है, और कर्मचारी इस पर दावा नहीं कर सकते।
पदोन्नति का अधिकार नहीं
अदालत ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के पास पदोन्नति का कोई निहित अधिकार या वैध अपेक्षा नहीं होती। कर्मचारियों का केवल यह अधिकार है कि उनकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाए।
चयन प्रक्रिया में बदलाव
पीठ ने यह भी कहा कि यदि सरकार यह तय करती है कि किसी रिक्त पद को पदोन्नति के माध्यम से नहीं भरा जाएगा, तो उसे नियुक्ति करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी का पद चयन आधारित था, न कि पदोन्नति पर। इसलिए, चयन की प्रक्रिया पूरी तरह से सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है।
रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक उपयोग पर सख्ती
एक अन्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के निकाय अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे रिहायशी इलाकों के व्यावसायिक उपयोग की जांच करें और रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
अदालत ने कहा कि भवन नियमों और भूमि उपयोग मानकों का उल्लंघन नागरिकों और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। यह निर्देश 'लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य' मामले में दिया गया था।