सुप्रीम कोर्ट का बयान: धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देना समाज के लिए हानिकारक
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि यदि लोग धार्मिक प्रथाओं को अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे समाज और धर्म पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। न्यायालय ने यह टिप्पणी एक संविधान पीठ के दौरान की, जो विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही है। इसमें सबरीमाला मंदिर और दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित मामले शामिल हैं।
धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने का प्रभाव
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने लगेगा, तो यह भारतीय समाज पर गहरा असर डालेगा, क्योंकि धर्म समाज का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे मंदिरों के खुलने या बंद होने से संबंधित मामले भी अदालतों में पहुंच सकते हैं।
यह टिप्पणी दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी एक पुरानी याचिका पर आई, जिसमें जस्टिस एमएम सुन्द्रेश ने कहा कि यदि ऐसे विवादों को अनुमति दी गई, तो हर व्यक्ति हर चीज पर सवाल उठाएगा, जिससे धर्म में विघटन हो सकता है।
धार्मिक प्रथाओं की सुरक्षा
दाऊदी बोहरा समुदाय के वकील राजू रामचंद्रन ने अदालत में तर्क दिया कि यदि कोई प्रथा सामाजिक या व्यक्तिगत कारणों से जुड़ी है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और संस्कृति से है, और धर्म इसमें एक महत्वपूर्ण तत्व है। इसे तोड़ना उचित नहीं होगा।
1962 के फैसले को चुनौती
दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें 1962 के एक फैसले को चुनौती दी गई थी। उस फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना, समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है।
इस फैसले के अनुसार, 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है।