सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्टाचार कानून पर बंटा फैसला: धारा 17A की वैधता पर बहस
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
धारा 17A की वैधता: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून के 2018 के प्रावधान की वैधता पर विभाजित निर्णय सुनाया, जिसमें सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पहले अनुमति की आवश्यकता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A असंवैधानिक है और इसे समाप्त किया जाना चाहिए। वहीं, जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इसे संवैधानिक मानते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि पूर्व अनुमति की शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के खिलाफ है, जो जांच को बाधित करती है और भ्रष्ट व्यक्तियों को संरक्षण देती है। यह बेंच केवल दो जजों की थी, और उनके मत भिन्न होने के कारण कोई अंतिम निर्णय नहीं आ सका। इस बंटे हुए फैसले के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के पास जाएगा, जो इस मामले की सुनवाई के लिए एक बड़ी बेंच का गठन करेंगे। यह माना जा रहा है कि सीजेआई द्वारा गठित बेंच का निर्णय इस मामले में अंतिम होगा।
बेंच के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा, “दोनों जजों के निर्णय अलग-अलग हैं। सीनियर जज ने कहा कि धारा 17A असंवैधानिक है और यह पूर्व में आए दो बड़े बेंच के निर्णयों के खिलाफ है। दूसरे जज ने कहा कि यदि मंजूरी केवल सरकार से ली जाती है, तो यह कानून असंवैधानिक होगा, लेकिन यदि मंजूरी किसी स्वतंत्र प्राधिकरण जैसे लोकपाल या लोकायुक्त से ली जाती है, तो धारा 17A को सही ठहराया जा सकता है।”