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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: 15 साल की दूरी को माना गया मानसिक क्रूरता

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 15 साल की दूरी को मानसिक क्रूरता मानते हुए तलाक को मंजूरी दी है। यह मामला दो सरकारी डॉक्टरों के बीच का है, जिनकी शादी के बाद से कोई संतान नहीं हुई और वे लंबे समय से अलग रह रहे थे। अदालत ने कहा कि जब रिश्ता समाप्त हो चुका है, तो इसे केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में बनाए रखना उचित नहीं है। जानें इस फैसले के पीछे की पूरी कहानी और अदालत के विचार।
 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी लंबे समय तक एक-दूसरे से अलग रहते हैं और उनके बीच संबंध सुधारने की कोई वास्तविक कोशिश नहीं की जाती है, तो इसे 'मानसिक क्रूरता' माना जाएगा, जो तलाक का एक वैध आधार है। इस टिप्पणी के साथ, अदालत ने एक ऐसे दंपति के तलाक को मंजूरी दी है, जो शादी के बाद केवल दो-तीन महीने साथ रहे और पिछले 15 वर्षों से अलग रह रहे थे। अदालत ने कहा कि जब रिश्ता वास्तव में समाप्त हो चुका हो, तो शादी को केवल एक कानूनी औपचारिकता के रूप में बनाए रखना उचित नहीं है।


पति-पत्नी के बीच विवाद का विवरण

यह मामला दो सरकारी चिकित्सकों से संबंधित है, जिनकी शादी 5 दिसंबर 2007 को गुजरात के नडियाद खेड़ा में हुई थी। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई। प्रारंभिक दिनों में पत्नी अक्सर जल्दी सो जाती थीं और अपने कमरे को अंदर से बंद कर लेती थीं। पति के दरवाजा खटखटाने पर भी वह नहीं खोलती थीं, जिससे पति को मजबूरन दूसरे कमरे में सोना पड़ता था। इसी मानसिक प्रताड़ना के आधार पर पति ने 2009 में राजस्थान के भरतपुर की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पति क्रूरता साबित करने में असफल रहे हैं। हालांकि, जनवरी 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक मंजूर कर लिया, जिसके खिलाफ पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।


मानसिक क्रूरता की परिभाषा

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने मामले की गहन सुनवाई की। अदालत ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि बिना किसी ठोस कारण के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से एकतरफा इनकार करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। बेंच ने यह भी कहा कि शादी केवल एकतरफा अधिकार नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक समर्थन, वफादारी और जिम्मेदारी का साझा बंधन है।


शादी की वास्तविकता

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी ने हर अदालत में शादी को बनाए रखने की इच्छा जताई, लेकिन इसे सच मानना कठिन था। पत्नी गुजरात में नौकरी कर रही थीं और उन्होंने कभी भी पति के साथ रहने का प्रयास नहीं किया। अदालत ने कहा कि 'शब्दों से ज्यादा इंसान के काम बोलते हैं'। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कराई गई मध्यस्थता भी विफल रही थी।


सुप्रीम कोर्ट की विशेष शक्तियों का प्रयोग

दोनों पक्षों के अलग-अलग पेशेवर रास्तों और 15 साल के अलगाव को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह रिश्ता पूरी तरह से टूट चुका है और इसके सुधरने की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत 'पूर्ण न्याय' करने की अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए शादी को समाप्त करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि एक मृत रिश्ते को जबरदस्ती खींचना केवल हताशा को बढ़ाता है। चूंकि दोनों ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र सरकारी डॉक्टर हैं और उनका कोई बच्चा नहीं है, इसलिए इस तलाक का किसी तीसरे पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।