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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि हिंदू धर्म से मुस्लिम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व के निर्णय को बरकरार रखता है। जानें इस फैसले के पीछे की वजहें और इसके संभावित प्रभाव।
 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय


नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि जो लोग हिंदू धर्म से मुस्लिम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होते हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व के निर्णय को भी बरकरार रखा है।


यह ध्यान देने योग्य है कि तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को इस्लाम अपनाने वाले पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के लोगों को मुस्लिम पिछड़े वर्ग में शामिल करने की अनुमति दी थी। लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।


सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर शामिल थे, ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म से गैर हिंदू धर्म में जाता है, वह संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। अदालत ने 1950 के अनुसूचित जाति आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म के अनुयायियों को ही दिया जा सकता है।


अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के साथ ही व्यक्ति का अपनी मूल जाति से जुड़ा अनुसूचित जाति दर्जा समाप्त हो जाता है। इस मामले में, समीर अहमद नामक व्यक्ति ने 2015 में इस्लाम अपनाया और धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने 25 जून 2026 को सरकार के आदेश को रद्द कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को भी सही ठहराया है।