सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: धर्मांतरण से अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धर्मांतरण से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जो अनुसूचित जाति के अधिकारों से जुड़ा है। अदालत ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) में धर्मांतरण करता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा खो देता है।
फैसले की मुख्य बातें
अदालत ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद कोई भी व्यक्ति SC समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता और न ही वह SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Prevention of Atrocities Act) के तहत सुरक्षा की मांग कर सकता है।
मामले का संदर्भ
यह आदेश एक व्यक्ति के मामले में आया, जिसने ईसाई धर्म अपनाकर पादरी के रूप में कार्य किया, लेकिन बाद में उसके साथ हुए हमले के संबंध में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया। अभियुक्तों ने इस पर आपत्ति जताई थी। न्यायालय ने पहले के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल आरक्षण का लाभ पाने के लिए, बिना सच्ची आस्था के धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है।
धर्मांतरण पर अन्य घटनाक्रम
मार्च 2026 में, महाराष्ट्र विधानसभा ने "महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026" पारित किया है, जो जबरन धर्मांतरण, धोखे या लालच के आधार पर होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकता है। अवैध धर्मांतरण के लिए 7 साल की जेल और 1 लाख रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया है। यदि पीड़ित महिला, नाबालिग, या SC/ST है, तो 7 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। सामूहिक धर्मांतरण के लिए 10 साल तक की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। यदि विवाह का एकमात्र उद्देश्य धर्मांतरण है, तो ऐसा विवाह अवैध माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने कहा है कि जबरन धर्मांतरण देश की सुरक्षा और धर्म की स्वतंत्रता के लिए खतरा है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सहित कई राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।