सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: शारीरिक सजा को पॉस्को अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना गया
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि शारीरिक दंड देना पॉस्को अधिनियम के अंतर्गत अपराध नहीं है। यह टिप्पणी उस समय की गई जब कोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक शिक्षक गलत निर्णय या अनुचित शारीरिक दंड के लिए जिम्मेदार हो सकता है, लेकिन केवल इसी कारण से कक्षा में अनुशासन बनाए रखने का प्रयास बच्चों के यौन अपराधों से बचाने के लिए पॉस्को अधिनियम का उल्लंघन नहीं है।
जस्टिस उज्जल भुयान और अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने यह निर्णय पश्चिम बंगाल के एक शिक्षक के खिलाफ पॉस्को मामले को रद्द करते हुए दिया। शिक्षक पर आरोप था कि उसने भूगोल की कक्षा में दो 10वीं कक्षा की छात्राओं को पीठ और कमर पर मारा था जब उन्होंने सवालों के जवाब नहीं दिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षक को इस स्थिति को अधिक संवेदनशीलता से संभालना चाहिए था, लेकिन उसके खिलाफ जो कार्रवाई की गई है, वह पॉस्को अधिनियम के सेक्शन 10 के तहत यौन अपराध नहीं मानी जा सकती। बेंच ने 8 सितंबर को दिए गए अपने आदेश में कहा, 'अपीलकर्ता की लापरवाही या शारीरिक दंड देना पॉस्को एक्ट के सेक्शन 10 के अंतर्गत नहीं आता।'
शिकायत का विवरण
फिजिकली टच किए जाने की शिकायत
आरोपी शिक्षक पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले के एक स्कूल में भूगोल पढ़ाता था। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, महिला शिक्षकों के एक समूह ने 24 जून, 2025 को प्रिंसिपल को सूचित किया कि 10वीं कक्षा की कुछ लड़कियों ने शिक्षक द्वारा फिजिकली टच किए जाने की शिकायत की थी। इसके बाद एक बैठक आयोजित की गई और जिला चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट को सूचित किया गया, जिसके प्रतिनिधि बाद में स्कूल पहुंचे और मामला कोर्ट तक पहुंचा।