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सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें सरकारों की विफलता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व शामिल है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को न्यायपालिका के समान महत्वपूर्ण बताया। इस मामले में अगली सुनवाई 14 मई 2026 को होगी। जानें और क्या कहा गया कोर्ट में।
 

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों की उस विफलता पर कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से कार्य करने के लिए आवश्यक कानून बनाने में वर्षों की देरी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया कि अनूप बारनवाल के फैसले के बावजूद संसद ने अब तक आवश्यक कानून क्यों नहीं बनाया। इस दौरान, सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति पर भी चर्चा हुई और कहा गया कि काश जजों की नियुक्ति इतनी तेजी से होती।


चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल

सीनियर वकील विजय हंसारिया ने तर्क दिया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जल्दबाजी में की गई। उन्होंने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष से सही राय नहीं ली गई। 13 मार्च 2024 को उन्हें 200 नामों की सूची दी गई थी और अगले ही दिन नामों का चयन कर लिया गया।


न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व

याचिकाकर्ताओं ने जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष यह तर्क दिया कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समान महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका और सरकार को चुनाव आयोग की नियुक्तियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे चापलूसों की नियुक्ति होगी, जिससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी।


सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि वे चाहते हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में भी ऐसी ही तत्परता दिखाई जाए, विशेषकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में। हालांकि, बेंच ने हंसारिया के इस आरोप को मानने से इनकार कर दिया कि अदालती कार्यवाही में बाधा डालने के लिए उनकी नियुक्ति की गई थी, क्योंकि इस आरोप को साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया था।


डॉ. आंबेडकर का संदर्भ

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुमत की तानाशाही है। उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि संविधान लागू होने के महज तीन साल बाद उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा।


2023 कानून की चुनौती

याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।


अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 14 मई 2026 को निर्धारित की है।