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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: लिव-इन रिलेशनशिप में यौन उत्पीड़न के आरोपों पर नई बहस

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में यौन उत्पीड़न के आरोपों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सहमति से रहने के बाद अचानक आरोप लगाना आसान नहीं है। जानें इस मामले में अदालत का क्या कहना है और भारतीय कानून इस पर क्या दृष्टिकोण रखता है।
 

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी


नई दिल्ली: क्या एक महिला अपने साथी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा सकती है, जबकि वे 15 वर्षों तक एक साथ रहे? इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक नई बहस को जन्म दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद रेप का मामला बनाना आसान नहीं है।


मामले का विवरण

यह मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ के समक्ष आया। एक महिला ने अपने पूर्व साथी पर शादी का झूठा वादा करके यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। सुनवाई के दौरान, अदालत ने पूछा कि 15 वर्षों तक एक साथ रहने और बच्चे के होने के बाद अचानक रेप का आरोप किस आधार पर लगाया जा रहा है।


अदालत की प्रतिक्रिया

अदालत ने कहा कि यदि रिश्ता लंबे समय तक आपसी सहमति से चला है, तो केवल ब्रेकअप के बाद उसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने इस तरह के मामलों में कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर भी चिंता व्यक्त की।


लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी पहलू

भारतीय कानून के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध नहीं माना जाता। दो वयस्क अपनी इच्छा से एक साथ रह सकते हैं। हालांकि, इसके लिए कोई विशेष कानून नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों ने इसे मान्यता दी है। यदि रिश्ता लंबे समय तक चलता है, तो अदालत इसे शादी जैसे संबंध के रूप में मान सकती है।


रेप के आरोपों की वैधता

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा प्रश्न सहमति का होता है। यदि महिला यह साबित कर सके कि उसे शादी का झूठा वादा करके धोखा दिया गया और शारीरिक संबंध बनाए गए, तो मामला गंभीर हो सकता है। लेकिन केवल रिश्ते के टूटने के बाद रेप का आरोप लगाना आसान नहीं होता।


पत्नी के मामले में कानून

पत्नी के मामले में कानून अलग तरीके से कार्य करता है। यदि शादी के बाद पत्नी अपने पति पर जबरन संबंध बनाने या यौन उत्पीड़न का आरोप लगाती है, तो मामला घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत देखा जाता है। यहां शादी की अवधि मायने नहीं रखती। यदि पत्नी की इच्छा के खिलाफ संबंध बनाए जाते हैं, तो उसे कानूनी सुरक्षा मिल सकती है।


सुप्रीम कोर्ट की आगे की टिप्पणी

भारतीय न्याय व्यवस्था में सहमति और धोखे के बीच की रेखा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। अदालत हर मामले को अलग तथ्यों और सबूतों के आधार पर देखती है। केवल आरोप नहीं, बल्कि साक्ष्य ही अंतिम निर्णय को निर्धारित करते हैं।


सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने स्पष्ट कर दिया है कि लंबे समय तक सहमति से बने रिश्ते को बाद में केवल आरोपों के आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता। कानून का उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, न कि व्यक्तिगत विवादों को आपराधिक रंग देना।