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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: वंदे मातरम न गाने पर नहीं होगी आपराधिक कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से इसे नहीं गाता है, तो उस पर आपराधिक कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस मामले में गायक टीएम कृष्णा ने याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरों को अनिवार्य बनाना धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन बताया। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे की वजहें।
 

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय


नई दिल्ली। वंदे मातरम के प्रति सम्मान को लेकर केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है, तो उस पर आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। यह टिप्पणी मंगलवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस विषय पर जवाब मांगा है।


सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका पर विचार करते हुए यह तय किया कि क्या वंदे मातरम न गाने को दंडनीय अपराध माना जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक। उल्लेखनीय है कि संसद के मानसून सत्र में पारित कानून के अनुसार, छह अंतरे गाने की अनिवार्यता तय की गई है और वंदे मातरम के गायन में जानबूझकर बाधा डालने को अपराध माना गया है।


इस मामले में गायक टीएम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरे हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान करते हैं। उनका तर्क है कि इन अंतरों का अनिवार्य गायन करना देश की धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है। यह ध्यान देने योग्य है कि वंदे मातरम को कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन बिल 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित हुआ था। इसके बाद, छह अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बन गया।


टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि वंदे मातरम से संबंधित कानून की व्याख्या करते समय 1986 के 'बिजो इमैनुअल' फैसले में निर्धारित सिद्धांतों को लागू किया जाएगा। इस मामले में, 1986 में बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन वे राष्ट्रगान के समय सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें सजा नहीं दी जा सकती।