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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से चुनाव आयोग की मुश्किलें बढ़ीं

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के कार्यों पर गंभीर टिप्पणी की है, जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की स्थिति और भी कठिन हो गई है। अदालत ने कहा है कि यदि आयोग ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उसके निर्णयों को रद्द किया जा सकता है। इसके अलावा, फॉर्म छह में बदलाव की अनुमति नहीं दी गई है, जिससे आयोग की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से होने चाहिए।
 

चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी


नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की स्थिति अब और भी कठिन होती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की टिप्पणी के बाद, सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के कार्यों पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उसके निर्णयों को रद्द किया जा सकता है।


अदालत ने यह भी कहा कि पहली बार मतदाता के नाम जोड़ने के लिए फॉर्म छह में बदलाव की अनुमति नहीं दी गई है। उल्लेखनीय है कि 'इंडियन एक्सप्रेस' ने एक खोजी रिपोर्ट में बताया था कि फॉर्म छह में तीन नई घोषणाएं जोड़ी गई हैं। इसके बाद चुनाव आयुक्तों की एक बैठक हुई, जिसमें एक संयुक्त बयान जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि फॉर्म छह के संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति प्राप्त है।


हालांकि, अब अदालत ने स्पष्ट किया है कि उसने किसी भी बदलाव की स्वीकृति नहीं दी है। यदि यह साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर गलत जानकारी दी गई है, तो चुनाव आयोग की स्थिति और भी खराब हो सकती है। सोमवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जो बातें कहीं, वे चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए काफी नुकसानदायक हैं।


मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप है कि उन्होंने एसआईआर से संबंधित 14 निर्णय दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए हैं। अदालत ने उन्हें निलंबित करने की याचिका पर अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि यदि निर्णय बिना सहमति के लिए गए हैं, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है।


सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि फॉर्म छह में किसी भी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। ध्यान देने योग्य है कि नौ दिन पहले चुनाव आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म छह के साथ जोड़ी गई घोषणाओं को सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृति मिली है।


सोमवार को सुनवाई में दाखिल याचिकाओं में से एक राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिसमें वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने दलीलें पेश कीं। दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने लगाई, जिसमें सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने प्रतिनिधित्व किया। सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस की बेंच ने कहा कि कोई भी खबर पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले चुनाव आयोग का जवाब और रिकॉर्ड देखना आवश्यक है।


चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाने चाहिए। अर्थात्, तीन सदस्यीय आयोग में किसी एक सदस्य का अकेला निर्णय पूरे आयोग का निर्णय नहीं माना जा सकता। इसके आगे उन्होंने कहा कि पहले रिकॉर्ड देखना होगा। केवल आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सभी निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए थे। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि कोई निर्णय आवश्यक प्रक्रिया के बिना लिया गया था, तो उस पर रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है।