सुप्रीम कोर्ट की नई पहल: यौन उत्पीड़न मामलों में संवेदनशीलता और मानवता का ध्यान
नई दिशा में सुप्रीम कोर्ट का कदम
नई दिल्ली: यौन उत्पीड़न और लैंगिक हिंसा से संबंधित संवेदनशील कानूनी मामलों में न्यायालयों की भाषा और प्रक्रिया को अधिक मानवीय और निष्पक्ष बनाने के लिए भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट जारी की है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक निर्णयों में पुरानी रूढ़िवादी सोच और पीड़ितों पर आरोप लगाने वाली शब्दावली को समाप्त किया जाना चाहिए।
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य न्यायाधीशों में संवैधानिक मूल्यों और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है, ताकि अदालत में आने वाली महिलाओं को संवेदनहीन भाषा के कारण पुनः किसी मानसिक आघात का सामना न करना पड़े।
न्यूट्रल शब्दों का उपयोग
न्यूट्रल शब्दों को अपनाने की हिदायत
रिपोर्ट में कहा गया है कि 'पवित्रता खो दी', 'बेबस महिला', 'लज्जा भंग की' जैसे शब्द महिला की सामाजिक छवि को प्रभावित करते हैं। इसके बजाय, अदालतों को 'पीड़ित', 'सर्वाइवर', 'शिकायतकर्ता', 'शरीर पर अधिकार' और 'यौन हमला' जैसे संवैधानिक और न्यूट्रल शब्दों का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
समिति ने यह भी बताया कि यौन अपराधों को केवल 'हवस' या 'वासना' के रूप में संदर्भित करना पुरुषों की यौन इच्छाओं को अनियंत्रित रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे गंभीर अपराध का कानूनी महत्व कम हो जाता है। न्यायशास्त्र का मुख्य ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि पीड़ित की सहमति का उल्लंघन हुआ है और उसके मौलिक अधिकारों पर आघात पहुँचा है।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण कदम
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम
ट्रायल कोर्ट में गवाही की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए रिपोर्ट में जजों को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया गया है। उन्हें ऐसी किसी भी अपमानजनक या आक्रामक जिरह को तुरंत रोकने के लिए कहा गया है, जो सर्वाइवर के पिछले यौन इतिहास या व्यक्तिगत आचरण पर सवाल उठाती हो। समिति ने चेतावनी दी है कि किसी भी सभ्य समाज में किसी महिला को उसके कपड़ों या व्यवहार के आधार पर आंकना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
सुनवाई के दौरान बुनियादी शिष्टाचार का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है, जिसमें सर्वाइवर को बैठने के लिए कुर्सी और पानी उपलब्ध कराना, अनावश्यक लोगों को अदालत कक्ष से बाहर रखना और भयमुक्त वातावरण तैयार करना शामिल है।
संवेदनशीलता के लिए सुरक्षा उपाय
सुरक्षा के उपाय
सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी, 2026 को यौन अपराधों से संबंधित सुनवाई में सहानुभूति और संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए दिशानिर्देश तय करने के लिए इस विशेष पैनल का गठन किया था। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि अदालतों को पीड़ितों की सुरक्षा के लिए उनकी याचिका का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना राज्य और पीठ की प्राथमिक कानूनी जिम्मेदारी है।