सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण पर उठाए सवाल, सामाजिक गतिशीलता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने आज यह प्रश्न उठाया कि क्या उन परिवारों के बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, जिन्होंने आरक्षण के माध्यम से शिक्षा और आर्थिक उन्नति प्राप्त की है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि माता-पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं, तो उन्हें आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण से सामाजिक गतिशीलता उत्पन्न होती है, इसलिए बच्चों के लिए आरक्षण की मांग करना इस समस्या का समाधान नहीं है।
आरक्षण की आवश्यकता पर विचार
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब माता-पिता शिक्षित और अच्छी नौकरी में हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों चाहिए? उन्हें आरक्षण से बाहर रखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जवल भुयान की पीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक हाईकोर्ट के उस निर्णय के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण से बाहर रखने का फैसला किया गया था।
कुरुबा समुदाय का मामला
यह मामला कुरुबा समुदाय के एक उम्मीदवार से संबंधित है, जिसे कर्नाटक के पिछड़े वर्गों में श्रेणी II(A) के तहत वर्गीकृत किया गया है। उसे कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में सहायक अभियंता (विद्युत) के पद पर चुना गया था।
हालांकि, जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने उसे जातिगत वैधता प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसकी पारिवारिक आय लगभग 19.48 लाख रुपए आंकी गई थी।
सामाजिक और आर्थिक प्रगति का प्रभाव
सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बार-बार चिंता व्यक्त की कि परिवारों की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के बावजूद आरक्षण के लाभ जारी हैं। उन्होंने कहा कि संतुलन होना आवश्यक है। यदि माता-पिता सरकारी सेवा में हैं और अच्छी स्थिति में हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
वकील शशांक रत्नू ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की कि सरकारी कर्मचारियों में उच्च आय का निर्धारण केवल वेतन के आधार पर नहीं किया जा सकता।
क्रीमी लेयर का निर्धारण
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि याचिकाकर्ता के पिता की मासिक बेसिक सेलरी 53,000 रुपए है, जबकि मां की 52,650 रुपए है। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक नहीं हैं।
उन्होंने तर्क किया कि यदि आय के सभी रूपों को ध्यान में रखा जाएगा, तो ओबीसी आरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा।
कर्नाटक हाईकोर्ट का निर्णय
यह याचिका कर्नाटक उत्तर न्यायालय की एक बेंच के फैसले के खिलाफ दायर की गई है, जिसने उम्मीदवार के पक्ष में सिंगल बेंच के फैसले को पलट दिया था। बेंच ने कहा कि क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए वेतन आय को बाहर रखने का नियम केवल केंद्र सरकार के अंतर्गत आरक्षण पर लागू होता है।
कर्नाटक की क्रीमी लेयर नीति के अनुसार, उम्मीदवार के परिवार की आय लागू सीमा से अधिक थी और वह क्रीमी लेयर के अंतर्गत आता था।