सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों के सीमांकन के लिए समिति को दी समयसीमा, जानें क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण
समिति को रिपोर्ट जमा करने की समयसीमा
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सीमांकन के लिए गठित समिति को अपनी रिपोर्ट पेश करने की समयसीमा निर्धारित कर दी है। अदालत ने समिति को 30 नवंबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। समिति ने रिपोर्ट तैयार करने के लिए फरवरी 2027 तक का समय मांगा था, लेकिन अदालत ने इसे अस्वीकार कर दिया।
समिति के समय विस्तार पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने समिति द्वारा अतिरिक्त समय की मांग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे समिति उनके रिटायरमेंट तक का समय मांग रही हो। सीजेआई सूर्यकांत 9 फरवरी को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि समयसीमा को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और समिति को निर्धारित समय में अपना कार्य पूरा करना होगा।
अंतरिम रिपोर्ट की आवश्यकता
जरूरत पड़ने पर अंतरिम रिपोर्ट पेश कर सकती है समिति
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर तक प्रस्तुत की जानी चाहिए। हालांकि, यदि किसी विशेष मुद्दे पर तात्कालिक निर्णय की आवश्यकता होती है, तो समिति विभिन्न विषयों पर अंतरिम रिपोर्ट भी पेश कर सकती है।
समिति की प्रगति
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि समिति ने एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार की है। हालांकि, संबंधित पक्षों से व्यापक बातचीत करने और उनकी आपत्तियों को सुनने के लिए समिति को और समय की आवश्यकता महसूस हुई।
अरावली का सीमांकन क्यों है महत्वपूर्ण?
क्यों अहम है अरावली का सीमांकन?
समिति ने राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों सहित अन्य प्रभावित पक्षों से चर्चा का हवाला देते हुए लगभग छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा था। अरावली की स्पष्ट और समान परिभाषा का निर्धारण पर्यावरण संरक्षण और भविष्य में खनन गतिविधियों के नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरू की थी। मई 2026 में अदालत ने पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था। समिति को अरावली पहाड़ियों और पूरी पर्वतमाला की एक समान परिभाषा तय करने की जिम्मेदारी दी गई है, जिसके आधार पर खनन गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सके। अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र है, जो रेगिस्तानी और शुष्क इलाकों तथा उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करती है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।