सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति पर याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने उन मंत्रियों और जन प्रतिनिधियों की नियुक्ति के लिए दिशानिर्देश मांगने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जो आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं। याचिका में यह अनुरोध किया गया था कि ऐसे व्यक्तियों को मंत्री पद या महत्वपूर्ण विभागों में नियुक्त करने से रोका जाए। इसमें यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को विधायकों और सांसदों की आपराधिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखना चाहिए।
सुनवाई का विवरण
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने की। याचिकाकर्ता दिलीप कुमार शर्मा ने स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 के तहत कोई नई अयोग्यता नहीं जोड़ना चाहते। उनका कहना था कि मंत्री चुनने और विभाग आवंटित करने का विवेकाधिकार कुछ मानकों के आधार पर होना चाहिए।
याचिका खारिज करने के कारण
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलील संवैधानिक नैतिकता पर आधारित है, जो बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आपराधिक कानून का दुरुपयोग होता है, और यह तय करना मुख्यमंत्री के विवेक पर छोड़ना चाहिए कि क्या किसी व्यक्ति का आपराधिक मामला सरकार के लिए शर्मनाक है।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की वकील निशा तिवारी ने बेंच से कहा कि उनका उद्देश्य कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियों को चुनौती देना नहीं है। उन्होंने कहा कि विवेकाधिकार का उपयोग उचित होना चाहिए और इसके लिए कुछ मानदंड स्थापित किए जाने चाहिए। जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसे दिशानिर्देश बनाना सुप्रीम कोर्ट के लिए मुश्किल हो सकता है।
ADR का विश्लेषण
याचिकाकर्ता ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण का हवाला दिया, जिसमें 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 4,092 विधायकों में से 1,861 ने आपराधिक मामले घोषित किए थे।
संभावित सुधार
यदि यह याचिका स्वीकार की जाती, तो इससे हत्या, बलात्कार, अपहरण या भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे नेताओं को संवेदनशील मंत्रालयों से दूर रखा जा सकता था। इससे मंत्रियों द्वारा अपने मामलों की जांच करने वाली पुलिस पर प्रभाव डालने का टकराव समाप्त होता। इसके अलावा, मंत्रिपरिषद में नियुक्तियों की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती।