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सुप्रीम कोर्ट ने करुर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों को नौकरी देने के आदेश पर रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने करुर भगदड़ के पीड़ितों के परिवारों को नौकरी देने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि सरकार को पीड़ित परिवारों की मदद करने का अधिकार है। यह मामला पिछले साल सितंबर में हुई भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोग मारे गए थे। जानें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय का क्या हुआ।
 

तमिलनाडु में करुर भगदड़ का मामला


तमिलनाडु: करुर में हुई भगदड़ के संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री विजय द्वारा पीड़ित परिवारों को नौकरी देने के आदेश को रद्द कर दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि ऐसी घटनाओं में सरकार पीड़ित परिवारों को नौकरी देने से क्यों मना कर सकती है। कोर्ट ने विजय सरकार के उस निर्णय का उल्लेख किया जिसमें करुर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने का प्रस्ताव था। हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगा दी।


भगदड़ की घटना का विवरण

पिछले साल सितंबर में टीवीके की रैली के दौरान भगदड़ हुई थी, जिसमें 41 लोग, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, मारे गए थे। उस समय डीएमके सरकार थी और रैली को विजय संबोधित कर रहे थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि विजय के देर से पहुंचने के कारण भीड़ बढ़ गई थी। इस दौरान पानी, खाना और शौचालय जैसी सुविधाओं की कमी भी थी। टीवीके ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे पुलिस की नाकामी बताया। पूर्व डीएमके मंत्री सेंथिल बालाजी पर साजिश का आरोप लगाया गया, जिसे उन्होंने नकार दिया।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?


सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "भगदड़ हुई, लोग मरे। यदि सरकार ने उन्हें कुछ राहत देने का निर्णय लिया और पैसे या नौकरी से मदद करने का सोचा, तो आप कैसे सवाल कर सकते हैं कि नौकरी नहीं दी जानी चाहिए? यदि परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति मर गया, तो क्या सरकार उसके बेटे या बेटी को नौकरी नहीं दे सकती?" कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव और अन्य को नोटिस जारी किया।


मद्रास हाईकोर्ट ने 27 जुलाई को विजय के आदेश को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सरकारी नौकरी में समान अवसर) का उल्लंघन है। इससे अन्य लोग भी ऐसी नौकरी की मांग करने लगेंगे। हाईकोर्ट ने कहा कि जो लोग लंबे समय से दयात्मक नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं, उनकी जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।