सुप्रीम कोर्ट ने छात्र को नोटिस जारी करने पर मजिस्ट्रेट को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के संदर्भ में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) के एक छात्र को नोटिस जारी करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त की है। बुधवार को, शीर्ष अदालत ने ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट से इस मामले पर स्पष्टीकरण मांगा। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट रूप से पूछा कि जब कोर्ट ने पहले ही छात्रों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस कैसे जारी किया?
वकील ने उठाया नोटिस का मुद्दा
वरिष्ठ वकील विश्वजीत भट्टाचार्य ने बेंच के समक्ष यह मामला उठाते हुए कहा कि प्रशासन छात्रों में भय का माहौल बना रहा है। उन्होंने बताया कि शीर्ष अदालत ने 1 सितंबर को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। इसके बावजूद, ग्रेटर नोएडा के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने सेकेंड ईयर के छात्र अक्षत त्रिपाठी को शांति व्यवस्था के नाम पर 5 लाख रुपये का मुचलका भरने का नोटिस दिया। हालांकि, विवाद बढ़ने पर पुलिस ने इस नोटिस को वापस ले लिया, लेकिन वकील ने इसे अदालत की अवमानना करार दिया।
CJI का कड़ा संदेश
सीजेआई सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर सहमति जताते हुए कहा कि देश के युवाओं के खिलाफ इस तरह की मनमानी कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि कोर्ट का आदेश स्पष्ट था और इसका उल्लंघन चिंताजनक है। उन्होंने वकील को सभी तथ्यों को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया और कहा कि अदालत संबंधित मजिस्ट्रेट से जवाब मांगेगी। पीठ के सदस्य जस्टिस बागची ने नोटिस वापसी पर पूछे गए सवाल पर वकील से कहा कि उन्हें इसकी औपचारिक जानकारी नहीं मिली है, केवल मीडिया के माध्यम से पता चला है।
प्रदर्शन में शामिल होने पर पुलिस की कार्रवाई
यह विवाद जीबीयू के छात्र अक्षत त्रिपाठी को मिले नोटिस से संबंधित है। पुलिस ने आरोप लगाया कि छात्र ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में अन्य विद्यार्थियों को उकसाया। हालांकि, छात्र ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने केवल शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन में भाग लिया था। पुलिस ने इसे कोई सजा नहीं बल्कि शांति बनाए रखने के लिए एक एहतियाती बॉंड नोटिस बताया, जिसे अब वापस ले लिया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अदालत के आदेशों की अनदेखी मानते हुए मामले की जांच का दायरा बढ़ा दिया है।