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सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल चुनाव प्रक्रिया में दखल देने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में दखल देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि मतदान से 10 दिन पहले वह चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसके अलावा, उन मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिनके नाम विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान हटा दिए गए हैं। इस निर्णय के पीछे कई महत्वपूर्ण बातें हैं, जिनमें मतदाता अधिकारों का संरक्षण और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता शामिल है। जानें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के विचार और आगे की संभावनाएं।
 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मतदान से 10 दिन पहले वह इस प्रक्रिया में कोई दखल नहीं देगी। इसके साथ ही, अदालत ने उन मतदाताओं को मतदान करने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया है, जिनके नाम मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान हटा दिए गए हैं। ऐसे लाखों मतदाताओं के मामले अपीलीय ट्रिब्यूनलों में लंबित हैं।


सुनवाई के दौरान अदालत के विचार

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा, 'यदि हम ऐसे मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति देंगे, तो उन लोगों के वोटिंग अधिकारों को छीनना होगा जिनके नाम एसआईआर की सूची में हैं।' अदालत ने यह भी कहा कि मतदान से 10 दिन पहले चुनाव प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि एसआईआर प्रक्रिया पर इसी तरह की आपत्तियां आती रहीं, तो चुनाव कैसे संपन्न होंगे।


कलकत्ता हाई कोर्ट की जानकारी

इससे पहले, कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 11 अप्रैल तक 34 लाख से अधिक अपीलें दायर की जा चुकी हैं, जिन पर निर्णय आना बाकी है। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव परिणामों में दखल तभी दिया जाएगा जब बड़ी संख्या में मतदाता बाहर किए गए हों और यह संख्या जीत के अंतर को प्रभावित करती हो।


जस्टिस बागची की चिंता

जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग से कहा, 'मान लीजिए कि जीत का अंतर दो प्रतिशत है और 15 प्रतिशत मतदाता वोट नहीं डाल सके, तो हमें इस पर विचार करना होगा। यह चिंता का विषय हो सकता है।' उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों से कुछ गलतियां हो सकती हैं। जस्टिस बागची ने कहा, 'न्यायिक अधिकारियों से सौ प्रतिशत सटीकता की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि वे बहुत दबाव में काम कर रहे हैं।'