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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वोत्तर के जनजातीय समुदाय की आयकर छूट पर याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वोत्तर राज्यों के अनुसूचित जनजाति समुदाय को आयकर छूट देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह मामला कानून निर्माण से संबंधित है और याचिकाकर्ता को अपनी मांगें संसद के समक्ष रखने की सलाह दी। याचिका में आयकर अधिनियम की धारा 11 को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि जनजातीय समुदाय को बिना किसी आय सीमा के आयकर से छूट दी जा रही है। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और अदालत के विचार।
 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्वोत्तर राज्यों के अनुसूचित जनजाति समुदाय को आयकर छूट देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला कानून निर्माण और सरकारी नीतियों से संबंधित है, इसलिए इसका निर्णय न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी मांगें और सुझाव संसद की समितियों और संबंधित सरकारी संस्थाओं के समक्ष प्रस्तुत करें।


अदालत की टिप्पणियाँ

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे मुख्य रूप से विधायी प्रकृति के हैं। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों पर विचार और बदलाव का अधिकार संसद और नीति निर्माताओं के पास है। पीठ ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधि इन मुद्दों से भलीभांति परिचित हैं और आवश्यकता पड़ने पर उचित निर्णय ले सकते हैं।


याचिका में उठाए गए सवाल

यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी। इसमें आयकर अधिनियम 2025 की धारा 11 और अनुसूची-3 की क्रम संख्या 19 को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि पूर्वोत्तर के अधिसूचित क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय को बिना किसी आय सीमा या अन्य शर्त के आयकर से पूरी छूट दी जा रही है।


क्रीमी लेयर लागू करने की मांग

याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि या तो इस प्रावधान को समाप्त किया जाए या फिर क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू की जाए। उनका तर्क था कि आर्थिक रूप से मजबूत वर्गों को भी समान रूप से लाभ मिलना उचित नहीं है। प्रस्ताव में कहा गया था कि एक निश्चित आय सीमा से ऊपर के लोगों को इस कर छूट के दायरे से बाहर किया जाए।


बदलते हालात का हवाला

याचिका में यह भी कहा गया कि जिस उद्देश्य से यह छूट दी गई थी, समय के साथ परिस्थितियां बदल चुकी हैं। पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर राज्यों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ऐसे में कर छूट की व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता बताई गई।


विशेषज्ञ समिति का सुझाव

याचिकाकर्ता ने आयकर छूट की समय-समय पर समीक्षा करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी मांग की थी। उनका कहना था कि इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को विधायी मंचों के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी।