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सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पुनर्गठन के लिए निर्देश दिए

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पुनर्गठन के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को काउंसिल के बड़े फैसलों में शामिल करने का आदेश दिया है। मनन मिश्रा के कार्यकाल को लेकर उठे विवाद और BCI में सत्ता के केंद्रीकरण पर भी चर्चा हुई। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और कोर्ट के आदेशों के पीछे की वजहें।
 

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

मंगलवार को, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कार्यों पर कड़ी निगरानी रखने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि नए चुनावों के माध्यम से BCI का पुनर्गठन होने तक, अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को काउंसिल के महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल किया जाना चाहिए। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस ज्योमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच द्वारा जारी किया गया।


मनन मिश्रा का कार्यकाल

बेंच ने स्पष्ट किया कि मनन मिश्रा का पद 2030 तक नहीं रहेगा। कोर्ट ने कहा कि उनका कार्यकाल अस्थायी है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक नई BCI अपने अधिकारियों का चुनाव नहीं कर लेती। यह सुनवाई राज्य बार काउंसिल चुनाव से संबंधित याचिकाओं पर हो रही थी, जिसमें मनन मिश्रा के कार्यकाल को 2030 तक बढ़ाने वाली अधिसूचना को चुनौती दी गई थी।


मनन मिश्रा पर विवाद

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 बैच से जुड़े विवाद पर टिप्पणी के कुछ दिन बाद आया है। मनन मिश्रा ने पहले राज्य बार काउंसिलों को छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश दिया था, जिसके बाद छात्रों ने CJI को दीक्षांत समारोह में बुलाने का विरोध किया। बाद में यह रोक हटा दी गई और छात्रों के खिलाफ कार्रवाई बंद कर दी गई। मनन मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी। बेंच ने कहा कि उनकी चिंता किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि BCI के समग्र कार्य और चुनाव प्रक्रिया को बहाल करने से है।


कार्यकाल बढ़ाने का विवाद

रिपोर्ट के अनुसार, नए विवाद की जड़ 2025 का एक नोटिफिकेशन है, जिसमें मनन मिश्रा और उपाध्यक्ष एस प्रभाकरन को 5 साल का कार्यकाल दिया गया। BCI के नियम 12(2) के अनुसार, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल केवल 2 साल होता है। याचिकाकर्ताओं की वकील माधवी दिवान ने कोर्ट को बताया कि मनन मिश्रा को 2 मार्च 2025 को अध्यक्ष चुना गया था और उनका कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक रखा गया। कोर्ट ने पूछा कि जब नियम दो साल का कार्यकाल निर्धारित करते हैं, तो इसे पांच साल कैसे किया जा सकता है।


दलीलें और नियम

एडवोकेट माधवी दीवान ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(3) के उपयोग पर भी सवाल उठाया। इस धारा के तहत BCI सदस्य नए सदस्यों के चुनाव तक पद पर बने रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह नियम खाली पद की समस्या को रोकने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका उपयोग चुनाव टालने के लिए किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह नियम केवल अस्थायी व्यवस्था के लिए है और अब राज्य बार काउंसिल चुनाव पूरे हो चुके हैं।


BCI में सत्ता का केंद्रीकरण

सुनवाई के दौरान BCI में सत्ता के केंद्रीकरण पर भी सवाल उठाए गए। एडवोकेट गोपाल शंकर नारायणन ने 2020 में बने पर्ल ट्रस्ट का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस ट्रस्ट में 11 लोगों को स्थायी ट्रस्टी बना दिया गया, चाहे वे BCI सदस्य रहें या नहीं। कोर्ट ने पूछा कि क्या BCI जैसी चुनी हुई संस्था अपनी संपत्ति से ऐसा ट्रस्ट बना सकती है जिसमें कुछ लोग सदस्यता खत्म होने के बाद भी हमेशा के लिए ट्रस्टी बने रहें।


अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भूमिका

माधवी दीवान ने सुझाव दिया कि जब तक BCI का पुनर्गठन नहीं होता, तब तक अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को हर महत्वपूर्ण निर्णय में शामिल किया जाना चाहिए। वकील सीयू सिंह ने कहा कि वर्तमान में निर्णय अध्यक्ष कार्यालय से बिना अधिक चर्चा के लिए जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि दोनों कानूनी अधिकारियों को रोजमर्रा के काम में शामिल होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी उपस्थिति आवश्यक होगी।


पुनर्गठन की डेडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिल के पुनर्गठन के लिए चार हफ्तों का समय निर्धारित किया है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को महिला सदस्यों को शामिल करने का कार्य दो हफ्तों में पूरा करना होगा। इसके बाद, राज्य बार काउंसिलों को एक हफ्ते में अपनी अंतिम सूची जारी करनी होगी। नई काउंसिलें फिर दो हफ्तों में अपने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और BCI के लिए प्रतिनिधि चुनेंगी। अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी।