सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में धार्मिक प्रथाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह उसके अधिकार क्षेत्र में है कि वह यह निर्धारित करे कि किसी धर्म में कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के संदर्भ में आई, जिसमें कहा गया था कि धर्मनिरपेक्ष अदालतों को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने स्पष्ट किया कि संसद का कानून अंतिम नहीं हो सकता। इस मामले की सुनवाई नौ जजों की संविधान पीठ कर रही है।
केंद्र सरकार की दलील
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से पूछा कि वह कैसे तय करेगी कि कोई प्रथा अंधविश्वास है। उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास है, तो यह अदालत का कार्य नहीं है। मेहता ने संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) का हवाला देते हुए कहा कि यह विधायिका का कार्य है कि वह सुधार कानून लाए। उन्होंने यह भी बताया कि काला जादू जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए कई कानून बनाए गए हैं।
अदालत का अधिकार क्षेत्र
जस्टिस अमानुल्लाह ने सॉलिसिटर जनरल की दलील का जवाब देते हुए कहा कि यह एक सरल सोच है। उन्होंने कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं। जस्टिस अमानुल्लाह ने यह भी कहा कि आगे की कार्रवाई विधायिका द्वारा तय की जाएगी, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि विधायिका का निर्णय अंतिम सत्य है। अदालत की भूमिका यहीं समाप्त नहीं होती।
धर्मनिरपेक्ष अदालत की सीमाएं
तुषार मेहता ने आगे कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा केवल अंधविश्वास है। उनका तर्क था कि अदालत के पास इस तरह की विद्वता नहीं है। मेहता ने कहा, 'आप कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं।' उन्होंने यह भी कहा कि नागालैंड के लिए जो धार्मिक है, वह किसी अन्य के लिए अंधविश्वास हो सकता है।
जादू-टोना पर सवाल
इस बीच, जस्टिस बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि जादू-टोना किसी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है, तो क्या वह अंधविश्वास नहीं माना जाएगा। जस्टिस बागची ने कहा कि यदि कोई धार्मिक प्रथा स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने उत्तर दिया कि न्यायिक समीक्षा अंधविश्वास के कारण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर की जा सकती है।
जस्टिस नागरत्ना की राय
जस्टिस नागरत्ना ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि अदालत को किसी धार्मिक प्रथा का निर्णय लेते समय उस विशेष धर्म के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। इसका अर्थ है कि बाहरी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि उस धर्म की आंतरिक समझ के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। बाद में इस मामले को बड़ी पीठ को भेजा गया था।