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सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय के खतने पर गंभीर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल कटिंग पर गंभीर सुनवाई हुई। अदालत ने इस प्रथा को महिलाओं के अधिकारों और स्वास्थ्य से जोड़ा, जबकि याचिकाकर्ता ने बताया कि बच्चियों को इस प्रक्रिया के लिए मजबूर किया जाता है। सुनवाई में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए, और अदालत ने इस परंपरा के खिलाफ कानून बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता का है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा है।
 

सुप्रीम कोर्ट में फीमेल जेनिटल कटिंग पर बहस


नई दिल्ली।  गुरुवार को भारत की सर्वोच्च अदालत में दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल कटिंग (FGC) पर गंभीर चर्चा हुई। इस सुनवाई में इस प्रथा को महिलाओं के अधिकारों, स्वास्थ्य और गरिमा से संबंधित मुद्दा बताते हुए इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की मांग की गई। मामला तब और संवेदनशील हो गया जब एक महिला याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि छोटी बच्चियों को इस प्रक्रिया के लिए मजबूर किया जाता है, जिसका दर्द उन्हें जीवनभर सताता है।


सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं। उनके साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार और अन्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस प्रथा के सामाजिक और कानूनी पहलुओं पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। याचिकाकर्ता मासूमा रानालवी की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यह प्रक्रिया आमतौर पर 6 से 7 साल की बच्चियों पर की जाती है, जो न तो इसके अर्थ को समझ सकती हैं और न ही सहमति देने की स्थिति में होती हैं।


उन्होंने यह भी बताया कि यह केवल धार्मिक या सामाजिक परंपरा का मामला नहीं है, बल्कि बच्चों के अधिकार, शारीरिक स्वायत्तता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ा है। अदालत में यह भी कहा गया कि इस प्रक्रिया के दौरान बच्चियों के जननांग का एक हिस्सा काटा जाता है, जिससे उन्हें असहनीय दर्द सहना पड़ता है। याचिकाकर्ता पक्ष ने दावा किया कि इससे कई नसें प्रभावित होती हैं और आगे चलकर महिलाओं को शारीरिक जटिलताओं, मानसिक तनाव और भावनात्मक आघात का सामना करना पड़ सकता है।


सुनवाई के दौरान वकील सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि इस प्रथा का विरोध करना समुदाय में आसान नहीं है। परिवारों पर सामाजिक दबाव होता है और जो लोग इसका विरोध करते हैं, उन्हें बहिष्कार का डर होता है। उन्होंने अदालत को बताया कि कई माता-पिता अपनी इच्छा के खिलाफ भी इस प्रथा को स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि विरोध करने पर समाज से उनके रिश्ते टूट सकते हैं और सामाजिक-आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।


जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी चिंता जताई कि इस विषय पर अब तक स्पष्ट कानून क्यों नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया से बच्चियों के शरीर पर स्थायी असर पड़ता है, तो इसे केवल परंपरा कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी सरकार और संसद की होती है।


याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत से मांग की कि इस प्रथा को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध माना जाए, क्योंकि इसमें नाबालिग बच्चियों के शरीर के साथ बिना सहमति हस्तक्षेप किया जाता है। उनका कहना था कि यह मामला केवल धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और मौलिक अधिकारों का भी है। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में आगे भी विस्तृत सुनवाई होगी। अदालत को यह तय करना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की सीमा कहाँ तक है और क्या किसी परंपरा के नाम पर बच्चियों के शरीर और अधिकारों से समझौता किया जा सकता है। देशभर में इस सुनवाई पर नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर भविष्य में महिलाओं और बच्चों से जुड़े कई संवेदनशील मामलों पर पड़ सकता है।