सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या नागरिकों की कानूनी स्थिति पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या नागरिकों की याचिका पर सुनवाई
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में पांच लापता रोहिंग्या नागरिकों की कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए दायर याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या भारत अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को सभी अधिकार देने के लिए कानून को इतना विस्तारित कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य नागरिकों के हितों की रक्षा करना है और ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका को 'फैंसीफुल' माना जा सकता है।
याचिका पर कड़ा रुख
याचिकाकर्ता ने बताया कि पांच रोहिंग्या पुलिस हिरासत से गायब हैं और बिना कानूनी प्रक्रिया के उन्हें निर्वासित नहीं किया जा सकता। इस पर CJI ने पूछा कि क्या अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को वही सुविधाएँ मिलनी चाहिए जो नागरिकों को मिलती हैं। उन्होंने कहा कि कानून को 'अनावश्यक रूप से खींचने' की आवश्यकता नहीं है।
CJI के सवाल: क्या अवैध प्रवेश पर अधिकार मिलेंगे?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सीमा पार करके या सुरंग बनाकर देश में प्रवेश करता है और फिर कानून से भोजन, आश्रय और शिक्षा की मांग करता है, तो क्या यह स्वीकार्य है? उन्होंने यह भी कहा कि देश के गरीब नागरिक पहले अधिकारों के हकदार हैं।
हैबियस कॉर्पस पर अदालत की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर करना उचित नहीं है। यह उपाय तब दिया जाता है जब किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखा गया हो और उसे अदालत में पेश करना आवश्यक हो। उन्होंने याचिका को 'अतिरंजित' बताया।
रोहिंग्या को शरणार्थी दर्जा नहीं
CJI ने स्पष्ट किया कि सरकार ने रोहिंग्या को शरणार्थी घोषित नहीं किया है, इसलिए अवैध प्रवेश करने वाले व्यक्तियों को देश में रखने की कोई बाध्यता नहीं है। उन्होंने उत्तरी सीमाओं की संवेदनशीलता का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 16 दिसंबर तक टाली
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस याचिका पर विचार तब होना चाहिए जब प्रभावित पक्ष खुद अदालत में उपस्थित हो। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 16 दिसंबर तक स्थगित कर दिया, ताकि इसे समान प्रकृति की अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुना जा सके।