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सुभाष चंद्रा के खिलाफ धन शोधन का मामला दर्ज, 1,322 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप

प्रवर्तन निदेशालय ने मीडिया व्यवसायी सुभाष चंद्रा के खिलाफ धन शोधन का मामला दर्ज किया है, जिसमें उन पर 1,322 करोड़ रुपये की ऋण धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया है। चंद्रा पर आरोप है कि उन्होंने अपनी संपत्ति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और बाद में ऋण चुकाने में विफल रहे। इस मामले में सीबीआई की प्राथमिकी का भी जिक्र है, जो एलआईसीएचएफएल की शिकायत पर आधारित है। जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज ने इस मामले को कंपनी से अलग बताया है।
 

धन शोधन के आरोप में मामला दर्ज


प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मीडिया व्यवसायी सुभाष चंद्रा के खिलाफ धन शोधन का मामला दर्ज किया है। यह मामला लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (एलआईसीएचएफएल) को 1,322 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने वाली कथित ऋण धोखाधड़ी से संबंधित है। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी।


सुभाष चंद्रा पर आरोप है कि उन्होंने एलआईसीएचएफएल से ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी संपत्ति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और बाद में ऋण चुकाने में विफल रहे।


अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी के आधार पर धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत यह मामला दर्ज किया गया है।


इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (जी) के एक प्रवक्ता ने कहा कि ईडी ने चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से मामला दर्ज किया है, और इसका कंपनी के संचालन से कोई संबंध नहीं है।


प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि ये मामले डॉ. सुभाष चंद्रा और उनके संस्थानों से संबंधित हैं और इसका 'जी' या उसके कार्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।


सीबीआई ने पहले एलआईसीएचएफएल की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया था, जिसके आधार पर ईडी ने धन शोधन का मामला शुरू किया।


सीबीआई की प्राथमिकी में एलआईसीएचएफएल ने आरोप लगाया कि चंद्रा ने दो ऋणों की मंजूरी के लिए अपनी संपत्ति से जुड़े प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे, जिनकी कुल राशि 980 करोड़ रुपये थी।


एलआईसीएचएफएल ने अगस्त में अपनी शिकायत में कहा था कि इन ऋणों के भुगतान में चूक के कारण उसे 1,322 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।


एलआईसीएचएफएल उन ऋणदाताओं में शामिल था जिन्होंने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) का रुख किया था, जिसमें चंद्रा की निजी संपत्ति से संबंधित 22,006 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले केवल 6.5 करोड़ रुपये ही मिल सकते हैं।


शिकायत में 500 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा का उल्लेख है, जो वसंत सागर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को दी गई थी। पैन इंडिया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड इस ऋण में सह-ऋणकर्ता थी। इसके अलावा, डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को दी गई 480 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा भी शिकायत का हिस्सा है।


शिकायत के अनुसार, वसंत सागर को दी गई 500 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा कंपनी के अधिग्रहण, अतिरिक्त ऋण और कारोबार के विस्तार के लिए मंजूर की गई थी। इसके लिए 28 मार्च, 2018 को चंद्रा द्वारा जारी निरंतर गारंटी को सुरक्षा के तौर पर लिया गया था।


प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि 480 करोड़ रुपये की डिजिटल ऋण सुविधा किराये से होने वाली भविष्य की आय को आधार बनाकर मंजूर की गई थी। इसके लिए भी चंद्रा ने निरंतर गारंटी दी थी।


ऋणदाता के अनुसार, चंद्रा ने अपनी कुल संपत्ति का जो प्रमाणपत्र जमा किया था, उसे डीजेएम एंड कंपनी ने 28 मार्च, 2018 को जारी किया था। इसमें उनकी कुल संपत्ति लगभग 59,000 करोड़ रुपये बताई गई थी।


एलआईसीएचएफएल ने कहा कि डिजिटल ऋण सुविधा की मंजूरी आंशिक रूप से चंद्रा द्वारा जमा किए गए कुल संपत्ति के एक अन्य प्रमाणपत्र पर आधारित थी। यह प्रमाणपत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट कंपनी एमपीजे एंड कंपनी ने छह जुलाई, 2018 को जारी किया था। इसमें चंद्रा की कुल संपत्ति 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी।


एलआईसीएचएफएल के अनुसार, बाद में दोनों ऋणों के भुगतान में चूक हुई।


सीबीआई की शिकायत में कहा गया है कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत बाद में हुई कार्यवाही के दौरान चंद्रा ने एलआईसीएचएफएल को सौंपे गए प्रमाणपत्रों में बताई गई अपनी कुल संपत्ति से इनकार किया था। प्राथमिकी के अनुसार, इन कार्यवाहियों के दौरान कारोबारी ने 2024 में अपनी कुल संपत्ति 31.79 करोड़ रुपये और 2017-18 में अधिकतम 40,000 करोड़ रुपये बताई थी।


प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि सुभाष चंद्रा ने ऋण लेने वाली कंपनियों वसंत सागर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड, पैन इंडिया इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और स्पिरिट इंफ्रापावर एंड मल्टीवेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड तथा उनके अधिकारियों और निदेशकों के साथ मिलीभगत कर एलआईसीएचएफएल को धोखा दिया और उनसे ऋण दिलवाया। इन कंपनियों ने बाद में ऋण की राशि का दुरुपयोग किया।


प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि चंद्रा ने अपनी कुल संपत्ति बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और एलआईसीएचएफएल को मुख्य ऋण लेने वाली कंपनियों को धन जारी करने के लिए राजी करने के मकसद से फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे।