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सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके का आंदोलन: क्या बनेगा नया जन आंदोलन?

लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके ने एक नया आंदोलन शुरू किया है, जिसका उद्देश्य 2011 के अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन की तरह प्रभावशाली बनाना है। हालांकि, वर्तमान में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे कि सरकार की नीतियों के खिलाफ न होना और प्रभावशाली चेहरों की कमी। क्या ये दोनों कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर पाएंगे? जानें इस लेख में उनके प्रयासों और संभावनाओं के बारे में।
 

सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके का प्रयास


लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' नामक एक सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से एक नया आंदोलन शुरू किया है। उनका उद्देश्य 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल द्वारा किए गए आंदोलन की तरह एक प्रभावशाली जन आंदोलन खड़ा करना है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा करना आसान नहीं दिखता।


हालांकि, इस समय मुद्दे काफी प्रासंगिक हैं। नीट यूजी परीक्षा रद्द होने से लाखों परिवार प्रभावित हुए हैं, और सीबीएसई की 12वीं परीक्षा में गड़बड़ियों ने भी लोगों में गुस्सा पैदा किया है। इसके अलावा, यूपी पुलिस भर्ती और महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा के पेपर लीक होने की घटनाएं भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।


फिर भी, यह संदेह है कि वांगचुक और दीपके कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर पाएंगे। अन्ना हजारे और केजरीवाल के समय में कई समर्थनकारी तत्व मौजूद थे, जबकि वर्तमान में ऐसा नहीं है।


अन्ना हजारे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कई पत्र लिखे थे और जंतर मंतर पर धरना देकर सरकार के खिलाफ जनभावना को जगाया था। इसके विपरीत, दीपके और वांगचुक को प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई है, जिससे यह संदेश गया है कि सरकार असहमति को दबाने का प्रयास नहीं कर रही है।


वांगचुक और दीपके का आंदोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि वे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। अन्ना और केजरीवाल का आंदोलन पूरी सरकार को भ्रष्ट साबित करने के लिए था, जबकि वांगचुक और दीपके का आंदोलन एक छोटे लक्ष्य पर केंद्रित है।


अन्ना और केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया था, जबकि वांगचुक की छवि पहले से ही सरकार द्वारा खराब की जा चुकी है। यह उनका तीसरा आंदोलन है, और उनकी छवि अन्ना हजारे जैसी नहीं है।


इसके अलावा, वांगचुक और दीपके के मंच पर कोई प्रभावशाली चेहरा नहीं है, जिससे आंदोलन की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। कुल मिलाकर, जनता में असंतोष है, लेकिन इसे एक बड़े आंदोलन में बदलने की क्षमता इन दोनों में नहीं दिखती।